Showing posts with label Optional Hindi Literature. Show all posts
Showing posts with label Optional Hindi Literature. Show all posts

स्वतंत्रता संग्राम की अवधि मे हुए हिन्दी के विकास का परिचय दीजिए।

स्वतवता संग्राम की अवधि मे हुए हिन्दी के विकास का परिचय दीजिए।

    स्वतंत्रता संग्राम की अवधि (1857-1947) में हिंदी एक बोली से निकलकर सम्पूर्ण राष्ट्र की संपर्क भाषा और राष्ट्रीय चेतना का सबसे सशक्त माध्यम बनी। इसने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जन-जन को एकजुट करने में अद्वितीय भूमिका निभाई।

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हिंदी के विकास को प्रमुख चरणों और क्षेत्रों में इस प्रकार समझा जा सकता है:-

1. भाषा का राष्ट्रीयकरण और संपर्क भाषा के रूप में उदय

जनता की भाषा: राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं (जैसे बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी और सुभाष चंद्र बोस) ने यह स्पष्ट रूप से समझ लिया था कि विदेशी भाषा (अंग्रेजी) के माध्यम से आम जनता को स्वतंत्रता संग्राम से नहीं जोड़ा जा सकता।

महात्मा गांधी का योगदान: महात्मा गांधी ने हिंदी को "जनमानस की भाषा" कहा। उनके अनुसार, "यदि हम भारत को एक राष्ट्र के रूप में देखना चाहते हैं, तो हिंदी ही एकमात्र ऐसी भाषा है जो देश के विभिन्न हिस्सों को जोड़ सकती है।"

"राष्ट्रभाषा का प्रचार: दक्षिण भारत में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए सी. राजगोपालचारी और एनी बेसेंट जैसे नेताओं ने 'दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा' की स्थापना की, जिससे हिंदी राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत हुई।

2. साहित्यिक चेतना और देशभक्तिपूर्ण साहित्य

इस काल के साहित्य ने लोगों के दिलों में क्रांति और देशभक्ति की ज्वाला भड़काई:

भारतेंदु युग: भारतेंदु हरिशचन्द्र ने हिंदी गद्य और नाटकों के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार किया और स्वदेशी का मंत्र दिया।

द्विवेदी युग: महावीर प्रसाद द्विवेदी ने हिंदी भाषा के व्याकरण को परिमार्जित (शुद्ध) किया। इस काल के कवियों ने राष्ट्रप्रेम को अपनी कविताओं का मुख्य विषय बनाया।

वीर रस के कवि: मैथिलीशरण गुप्त (भारत-भारती), माखनलाल चतुर्वेदी (पुष्प की अभिलाषा), रामधारी सिंह 'दिनकर', और रामप्रसाद 'बिस्मिल' जैसे कवियों की रचनाओं ने युवाओं में बलिदान की भावना उत्पन्न की।

3. हिंदी पत्रकारिता की भूमिका

पत्र-पत्रिकाओं ने ब्रिटिश सरकार की नीतियों का विरोध करने और जनमानस को जागरूक करने में बहुत बड़ा योगदान दिया:

प्रमुख समाचार पत्र: उदन्त मार्तण्ड (प्रथम हिंदी समाचार पत्र, 1826), प्रताप, कर्मवीर, केसरी (हिंदी संस्करण), और जागरण जैसे पत्रों ने स्वतंत्रता की अलख जगाई।

उद्देश्य: इन पत्र-पत्रिकाओं ने अंग्रेजी शासन के अत्याचारों को उजागर किया और स्वतंत्रता सेनानियों को राष्ट्रीय विचारों से अवगत कराया।

4. संस्थाओं और सम्मेलनों का योगदान

नागरी प्रचारिणी सभा (काशी): इस संस्था ने हिंदी के मानकीकरण और देवनागरी लिपि के प्रचार में बहुत महत्वपूर्ण कार्य किया।

हिंदी साहित्य सम्मेलन: 1910 में स्थापित इस संस्था ने हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित करने के लिए देशभर में आंदोलन और प्रचार कार्य किया।

    स्वतंत्रता संग्राम की इस लंबी अवधि में हिंदी केवल साहित्य का विषय नहीं रही, बल्कि यह एक हथियार बन गई। इसी व्यापक स्वीकार्यता और विकास के परिणामस्वरूप, स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 14 सितंबर 1949 को हिंदी को भारत की राजभाषा का दर्जा प्रदान किया और यह भारतीय संविधान का अभिन्न अंग बनी।edited 01:13 PM

पूर्वी हिंदी और पश्चिमी हिंदी के प्रमुख अंतर।

पूर्वी हिंदी और पश्चिमी हिंदी के प्रमुख अंतर। 

उत्तर:–

विज्ञान और तकनीक की भाषा के रूप में हिंदी का विकास।

विज्ञान और तकनीक की भाषा के रूप में हिंदी का विकास। 

उत्तर:– 

हिंदी भाषा के मानकीकरण में द्विवेदी-युग का योगदान।

हिंदी भाषा के मानकीकरण में द्विवेदी-युग का योगदान। 

उत्तर:–  

           किसी भाषा के बोलचाल के स्तर से ऊपर उठकर मानक रूप ग्रहण कर लेना, उसका मानकीकरण कहलाता है। भारतेन्दु युग में भाषायी द्वेत के बावजूद खड़ी बोली गद्य की भाषा के रूप में स्थापित हो चुकी थी किंतु उसका अभी भी मानक रूप में प्रयोग नहीं हो रहा था। हिंदी के मानकीकरण की दृष्टि से द्विवेदी-युग (1900–1918) महत्वपूर्ण है जिसमें सरस्वती पत्रिका के संपादक के रूप द्विवेदी जी ने इसे एक सक्रिय आंदोलन के रूप में उठाया। 

मानकीकरण में द्विवेदी युग का योगदान

  • विदेशी भाषा के जो शब्द हिंदी में प्रचलित हो गए है, उन्हें उसी रूप में स्वीकार कर लिया जाए। जैसे– अदालत(अरबी), रिक्शा(जापानी) ऑपरेशन(अंग्रेजी), सरकार(फारसी) आदि। 
  • जिन शब्दों का अमानक रूप हिंदी में प्रचलित है, उनका मानक रूप प्रयुक्त किया जाए। जैसे– इस्नें > इसनें, उस्का > उसका आदि। 
  • संज्ञा सही के साथ परसर्ग को सटाकर ना लिखा जाए। जैसे– जीत ने रचना को किताब दी। 
  • सर्वनाम शब्दों के संबंध में परसर्ग को सटाकर लिखा जाए। जैसे– मैने आपको सुबह ही बताया था। (मैं–सर्वनाम, ने–परसर्ग)
  • संस्कृत, फारसी, अरबी आदि भाषाओं के कई पुल्लिंग शब्द जो हिंदी में स्त्रीलिंग के रूप में व्यवहार में होते है, उन्हें स्त्रीलिंग के रूप में स्वीकार किया जाए। जैसे– आत्म, वायु, मर्यादा आदि। 
  • ब्रज भाषा के शब्द जो हिंदी में प्रयोग होते है या क्रिया के अमानक रूप, का प्रयोग बंद किया जाए। जैसे– आवैं, जावैं, लीजे, कीजैं आदि। 
  • कुछ शब्दों के बहुवचन रूप हिंदी में अमानक रूप के प्रयुक्त होते है, उनका मानक रूप में प्रयोग किया जाए। जैसे राजे > राजा (दो राजा, पांच राजा), लड़कियें > लड़कियाँ (दो लड़कियाँ > दस लड़कियाँ) आदि। 
  • केवल आकारंत विशेषणों को विकारी माना जाना चाहिए, शेष विशेषण अधिकारी ही माने जाने चाहिए। जैसे– काला > काली, काले। 
          इस प्रकार द्विवेदी युग में हिंदी में भाषायी अनुशासन को अपनाकर व्याकारणीक त्रुटियों को दूर करते हुए खड़ी बोली को हिंदी के मानक रूप में स्थापित किया। द्विवेदीजी की प्रेरणा से कामता प्रसाद गुरु ने ‘हिंदी व्याकरण’ के नाम से एक वृहद ग्रंथ लिखा। 





           

राष्ट्रभाषा हिन्दी के आंदोलन में सेठ गोविन्ददास के योगवान पर विचार कीजिए।

राष्ट्रभाषा हिन्दी के आंदोलन में सेठ गोविन्ददास के योगवान पर विचार कीजिए। 

उत्तर

        एक साहित्यकार , सांसद व स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ - साथ सेठ गोविन्ददास हिन्दी को भारत की राजभाषा बनाने के प्रबल समर्थक थे । सेठ गोविन्ददास ने हिन्दी के लिए काफी योगदान किया। उन्होंने अंग्रेजी रचनाओं की तर्ज पर हिन्दी में कई रचनाएं की।

        वे प्राचीन भारत का देते हुए संस्कृत के कोख से जन्मी हिन्दी को सर्वश्रेष्ठ मानते थे । उनका कहना था कि जब तक भारत के सारे काम - काज हिन्दी में नहीं होगें तब तक हिन्दी पिछड़ी हुई रहेगी ।

         सेठ गोविन्ददास मानते थे कि कुछ ऊंचे  पदो पर बैठे लोगों की वजह से आज हिन्दी इस दुरावस्था में है । ये वे लोग है जो अंग्रेजी पढ़े हैं । उनका मानना था कि अंग्रेजी एक कमजोर भाषा है जिसमे शब्द निर्माण की क्षमता हिन्दी से काफी कम है।

        उन्होने कहा कि यह बड़ी अजीब सी बात है कि हमें अपने ही देश में अपनी ही भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने के लिए लड़ना पड रहा है। यदि यहां पर विदेशियो का राज होता तो अलग बात थी । उन्होंने उदाहरण दिया कि अंग्रेजी के सारे तकनीकी शब्द लातिन या फिर यूनानी हैं । वे कहते थे कि हिन्दी में इतनी विभिन्नताएं है कि इनका शब्द निर्माण क्षमता सबसे अधिक है।

        सेठ गोविन्ददास ने हिन्दी भाषा की श्रेष्ठता को परिभाषित करने के लिए कई प्रयास किए। वे सरकारी नौकरी हेतु हिन्दी माध्यम की हमेशा वकालात करते रहे , साथ ही न्यायालय की भाषा हेतु भी । सेठ गोविन्ददास कहते हैं कि अंग्रेजी के हिमायती हिन्दी को शक्तिहीन बताते हैं तथा मौलिक सर्जन के विपरित बताते हैं । उन्होंने तर्क दिया कि किसी भाषा का पर्याय बनने की क्षमता होना या ना होना उसकी कमजोरी नहीं बन सकती । 

        कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि सेठ गोविदास ने हिन्दी की विशेषताओं को जागृत करने के साथ साथ हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का जबरदस्त काम किया।

 

देवनागरी लिपि के प्रमुख गुण।

 देवनागरी लिपि के प्रमुख गुण।

उत्तर

        देवनागरी लिपि का विकास ब्राह्मी लिपि से हुआ है। यह एक अक्षरात्मक लिपि है जिसे बांयी ओर से दांयी ओर लिखा जाता है। इस लिपि का प्रयोग हिन्दी , संस्कृत , मराठी , नेपाली आदि भाषाओं में किया जाता है। 

देवनागरी लिपि के प्रमुख गुण 

  • समवेततः प्रारम्भ मे मूल स्वर ( अ, आ, इ, ई, उ, ऊ ) और उनके संयुक्त स्वर ( ए , ऐ , ओ , बो ) तथा व्यंजनों का विशेषकर स्पर्श एवं अनुनासिक का विभाजन 
  • एक ध्वनि के लिए एक ही वर्ण संकेत। 
  • एक वर्ण संकेत से अनिवार्यत : एक ही ध्वनि व्यक्त।
  • उच्चारण के सूक्ष्मतम भेद को भी प्रकट करने की क्षमता।
  • वर्णमाला ध्वनि वैज्ञानिक पद्धति के अनुरूप है । 
  • देवनागरी लिपि को सीखना एकदम आसान केवल सीधी (।) , आड़ी ( - ) रेखा तथा अर्धवृत सीख लेने से अक्षर लिखना आसान।
  • देवनागरी लिपि का हर अक्षर शिरोरेखा युक्त है। 
  • संयुक्ताक्षरों को मिलाकर लिखने की एक अद्‌भूत विशेषता है ।
  • नागरी लिपि मे वर्ण - बोधक चिन्ह इतने भिन्न है कि किन्हीं दो चिन्हों के सम्बन्ध में परस्पर कोई भ्रम न हो।
  • भाषा की ध्वनियाँ उच्चारण की दृष्टि से विशेषतः परिवर्तित होती रहती है।  
  • देवनागरी लिपि में स्वर यदि स्वतंत्र रूप आते हैं तो पूरे वर्ण- चिन्ह का प्रयोग होता है जैसे- आग, ईद। किन्तु व्यंजन के साथ ‘अ’ के अतिरिक्त अन्य स्वरो का मात्रा - रूप प्रयोग होता है जैसे नाग, चतुर आदि। 

        हालांकि देवनागरी लिपि में कुछ जटिलाएं भी दिखती है किन्तु थोड़े बहुत समाधान के साथ देवनागरी लिपि को आसानी से सीखा जा सकता है ।

हिन्दी भाषा का मानक स्वरूप।

हिन्दी भाषा का मानक स्वरूप।

उत्तर– 

        हिन्दी भाषा के मानक स्वरूप से तात्पर्य हिन्दी भाषा के उस स्थिर रूप से है, जो उस पूरे क्षेत्र में शब्दावली तथा व्याकरण की दृष्टि से समझने योग्य तथा सभी लोगों द्वारा मान्य हो, बोधगम्य हो, एवं व्याकरण सम्मत हो। आधुनिक हिन्दी मानक शैली का विकास खड़ी बोली से हुआ है। 

        हिन्दी भाषा को मानक स्वरूप प्रदान करने का प्रयत्न द्विवेदी युग शुरु हुआ, जिसमे महावीर प्रसाद द्विवेदी जी का योगदान अविस्मरणीय है। 

        हिन्दी भाषा के मानक स्वरूप को चार स्तरों पर देखा जा सकता है यथा ध्वनि स्तर, शब्दस्तर, रूप स्तर तथा वाक्य स्तर पर

ध्वनि स्तर पर 

  • मानक हिन्दी की ध्वनियो को स्वर तथा व्यंजन में बाटा गया है।
  •  'अ' और 'ह' ध्वनिया साथ आने पर 'अ'  का उच्चारण 'ऐ' मानक माना जाता है जैसे- महल का उच्चारण मैहल, कहता→कैहता।
  • 'ऐ', 'औ' के बाद 'य' अथवा 'व' आने पर  उच्चारण 'अय' या 'अव' के रूप में मानक। जैसे कौवा→ कउवा। 
  • ज्ञ ' का उच्चारण संस्कृत के 'ज्य' की बजाय 'ग्य' रूप में मानक माना गया है।

शब्द के स्तर पर

  • दो लिंग यथा पुल्लिंग तथा स्त्रीलिंग एवम दो वचन , यथा एकवचन तथा बहुवचन। 
  • एक से अधिक रूप में प्रचलित शब्दो का एक रूप मानक जैसे मोजा → जुराब ( मानक ), गंजी – बनियान (मानक)।
  • कारको के लिए विभक्ति चिन्ह निश्चित जैसे कर्त्ता ( ने ) , कर्म ( को )।
  • हिन्दी में शब्दों का निर्माण उपसर्ग , प्रत्यय , संधि आदि से।

रूप के स्तर पर

  • रूप स्तर पर शब्दो को विकारी ( संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया और विशेषण ) तथा अविकारी (क्रिया विशेषण, संबंध सूचक, समुच्चयबोधक व संबोधन सूचक ) में विभाजित।
  • 'आ' के साथ अंत होने वाले एकवचन पुल्लिंग शब्दों के अंत में 'ऐ' लगाने पर बहुवचन बन जाते ( व्यक्तिवाचक संज्ञा तथा संबंध सूचक शब्दों को छोड़कर ) उदा . लड़का – लड़के, कपड़ा – कपड़े ।
  • स्त्रीलिंग शब्दों में 'अ' एकवचन के साथ अंत होने वालो में 'एँ' लगाने पर बहुवचन हो जाते। जैसे  बहन – बहनें, गाय – गाये। 
  • 'आ' से अंत होने वालों में स्त्रीलिंग शब्दों में 'एँ' को जोड़ा जाता है। जैसे माता – माताएं, महिला – महिलाएँ। 
  • विशेषय के लिंग, वचन और कारक के कारण, विशेषणों में परिवर्तन। जैसे छोटा लड़का/छोटी लड़की, मेरा घर/मेरी घड़ी 

वाक्य के स्तर पर 

  • पदक्रम की दृष्टि से वाक्य मे पहले कर्ता , फिर कर्म और अंत में क्रिया आती है। जैसे राम ने पत्र लिखा। इसमें राम (कर्ता), पत्र (क्रम) तथा लिखना (क्रिया)
  • विशेषण का प्रयोग प्राय: विशेषय के पूर्व - जैसे- राम अच्छा लड़का है । 
  • क्रिया विशेषण का प्रयोग क्रिया से पूर्व - जैसे- वह धीरे - धीरे चल रहा है । चलना  (क्रिया) धीरे –धीरे ( क्रिया विशेषण)।

Join Telegram

देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता।

देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता।
उत्तर – 

        देवनागरी लिपि एक वैज्ञानिक लिपि है। विश्व के किसी भी कोने में प्रयुक्त वर्णमाला उतने वैज्ञानिक रुप में वर्गीकृत नहीं है , जितने कि नागरी लिपि वैज्ञानिक रूप में वर्गीकृत है। 

        अन्य लिपियो जैसे उर्दू तथा रोमन लिपि एवं व्यंजन या व्यंजन के वैज्ञानिक वर्ग मिले - जुले रूप में रखे गये हैं। लेकिन देवनागरी लिपि में इस प्रकार की गड़बड़ी नहीं है। इसमें स्वर अलग है और व्यंजन अलग है। 

        समवेततः प्रारम्भ मे मूल स्वर ( अ, आ, इ, ई, उ, ऊ ) और उनके संयुक्त स्वर ( ए , ऐ , ओ , बो ) तथा व्यंजनों का विशेषकर स्पर्श एवं अनुनासिक का विभाजन तो और भी वैज्ञानिक है। 

        क, च, ट, त, प के वर्ग, स्थान पर आधारित के और हर व्यंजन वर्ग के व्यंजन घोषत्व के आधार पर दो प्रकार का होता है - प्रथम दो अघोष तथा अंतिम तीन संघोष। इसके साथ ही इनके वर्गीकरण या विभाजन में प्राणतत्व का भी ध्यान रखा गया है। पहले तीसरे और पांचवें अल्पप्राण है तथा दूसरे , चौथे महाप्राण।

        भाषा की ध्वनियाँ उच्चारण की दृष्टि से विशेषतः परिवर्तित होती रहती है। जिसका आशय यह हुआ कि एक समय में यह विशेषता किसी लिपि में होती है तथा किसी में नहीं। अंग्रेजी में यह गड़बड़ी है जैसे- 'क' ध्वनि के लिए C, K, CH, CK, Q आदि, लेकिन देवनागरी लिपि में इस प्रकार का अवगुण नहीं है। 

        देवनागरी लिपि में स्वर यदि स्वतंत्र रूप आते हैं तो पूरे वर्ण- चिन्ह का प्रयोग होता है जैसे- आग, ईद। किन्तु व्यंजन के साथ ‘अ’ के अतिरिक्त अन्य स्वरो का मात्रा - रूप प्रयोग होता है जैसे नाग, चतुर आदि। 

        इस प्रकार अनेक दृष्टियो से देवनागरी लिपि अत्यन्त वैज्ञानिक लिपि है, तथा उसकी कई विशेषताएं ऐसी हो जो अन्य लिपियों में देखने को नहीं मिलती है।

 

हिन्दी भाषा के मानकीकरण में नागरी लिपि के योगदान को स्पष्ट कीजिए।

 हिन्दी भाषा के मानकीकरण में नागरी लिपि के योगदान को स्पष्ट कीजिए।

 उत्तर – 

        भाषा के मानकीकरण का अभिप्राय है उसका बोली रूप से क्रमश : विकसित होकर एक ऐसी परिनिष्ठित भाषा का रूप धारण कर लेना जो धर्म , शिक्षा , साहित्य एवं प्रशासनिक कार्यकलाप में सर्वमान्य माध्यम बन सके। हिन्दी भाषा के मानकीकरण से तात्पर्य है खड़ी बोली से विकसित और नागरी लिपि में लिखी जाने वाली उस मानक भाषा से है जिसे उच्च हिन्दी या परिनिष्ठित हिन्दी भी कहा जाता है।

 हिन्दी भाषा के मानकीकरण में देवनागरी लिपि का योगदान 

  • देवनागरी लिपि में ध्वनि को व्यक्त करने के लिए एक चिन्ह का प्रयोग तथा प्रत्येक चिन्ह से एक ही ध्वनि का बोध होता है।
  • नागरी लिपि में मात्रा एवं वर्ण बोधक चिन्ह इतने भिन्न है कि किन्ही दो चिन्हों के स्वरूप में परस्पर कोई भ्रम नहीं है। 
  • नागरी लिपि के चिन्ह सुन्दर और कलात्मक होने के साथ - साथ आधुनिक लेखन और मुद्रण के यांत्रिक साधनों के लिए सरलता से अपनाये गये है।
  • देश की अधिकांश जनता नागरी लिपि से परिचित थी तथा इसका अन्य लिपियो साथ घनिष्ठ संबंध था, इसलिए हिन्दी के मानकीकरण को बल मिला।
  • नागरी लिपि के लेखन और उच्चारण एकरूपता, सुस्पष्टता है तथा किसी भी प्रकार की भ्रांति नहीं है।
  • नागरी लिपि भारत की स्वदेशी लिपि है तथा देश के जातीय जीवन, संस्कृति और इतर लिपियों से संस्कारतः जुड़ी हुई है। 
  • नागरी लिपि में आधुनिक यांत्रिक लेखन की सुविधाओं का उपयोग कर पाने की क्षमता भी विद्यमान थी। 
  • नागरी लिपि में प्रत्येक अक्षर शिरोरेखा से युक्त है जो हिन्दी को एक अलग पहचान देता है।

        इस प्रकार हिन्दी भाषा के मानकीकरण में देवनागरी लिपि ने विशिष्ट भूमिका निभाई , इसके साथ - साथ पर्याप्त मात्रा में साहित्य , समाचार पत्र तथा पोस्टर इत्यादि में देवनागरी लिपि के प्रयोग ने देश के जनमानस में इसको लोकप्रिय बना दिया।

Join Telegram

संत साहित्य की विशेषताएं (टिप्प्णी)

संत साहित्य की विशेषताएं (टिप्प्णी)

उत्तर–

        संत साहित्य के प्रवर्तक कवि कबीरदास है । संत कवियों की भाषा को सामान्यतः सधुक्कड़ी या पंचमेलखिचड़ी कहते हैं।जिसका अर्थ होता है — साधुओं की भाषा यानी ऐसी भाषा जो कई स्थानों की भाषाओं के संयोग से बनी हो।

        अधिकांश संत कवि निम्न वर्णं तथा निम्न वर्ग से थे। उनकी रचनाएं आर्थिक , सामाजिक असमानता के विरुद्ध एक संघर्ष है । संत साहित्य सिद्ध - नाथो के साहित्य से प्रभावित है । प्रमुख संत कवि कबीरदास, रैदास, सुन्दरदास, मलूकदास आदि है। 

संत साहित्य की विशेषताए 

(i) निर्गुण ब्रह्म — निर्गुण ब्रह्म का अर्थ है ब्रह्म का कोई रूप नहीं है, कोई आकार " नही है। इसके साथ ही अवतारवाद का विरोध - 

“दसरथ सुत तिहुँ लोक बखाना।

राम नाम का मरम है आना ।।”

(ii) प्रेम पर बल— ज्ञानमार्गी संतो का काव्य ज्ञान से अधिक प्रेम पर बल देता -

 “ढाई आखर प्रेम का , पढ़े सो पंडित होय।”

(iii) रूढ़ियों व आडवंरो का विरोध- संतों ने रूढ़ियों तथा बाह्य आडम्बरो का विरोध किया है। साथ ही अन्तर्साधना पर बल दिया है- 

“पाहन पूजे हरि मिलै, तो मै पूंजू पहाड़।

 ताते यह चाकी भली, पीस खाय संसार।।”

 (iv) रहस्यवाद की अभिव्यक्ति - संतो ने भारतीय अद्वैतवाद तथा सूफी दर्शन को मिलाकर रहस्यवाद की सृष्टि की। जिसमें आत्मा तथा परमात्मा मिलकर एकाकार होते हैं।

“दुलहीनी गावहु मंगलाचार, 

हमारे घर आये हो राजा राम भरतार।।”

(v) गुरु की महिमा — संत साहित्य में ईश्वर से भी ऊंचा दर्जा गुरु को प्रदान किया है। क्योंकि गुरु ही ईश्वर प्राप्ति का मार्ग दिखाता है। जैसे 

“गुरु गोबिन्द दोउ खड़े , काके लागू पांयु।

बलिहारी गुरु आपनो , गोबिंद दियो मिलाय।।” 

        इसके अलावा संत काव्य में अनुभूति की प्रामाणिकता पर बल दिया गया । सतें कवि सुन्दरबस छंद ज्ञान से परिचित थे । संत प्राय आम भाषा का प्रयोग करते थे ।जिससे वह सामान्य शब्दावलियों में भी बड़ी से बड़ी बात कहते थे।

संत साहित्य के महत्व पर प्रकाश डालिए।

 संत साहित्य के महत्व पर प्रकाश डालिए।

उत्तर–

        भक्तिकाल की प्रथम धारा को संत काव्यधारा कहा जाता है । यह भक्ति साहित्य की निर्गुण काव्यधारा में ज्ञानाश्रयी शाखा से संबंधित है । निर्गुणपंथी कवियों को संत कहने की परम्परा प्रचलित थी । संत काव्यधारा में कबीरदास, गुरुनानक, दादूदयाल, सुन्दरदास, रज्जब आदि प्रमुख कवि है । 

        संत काव्यधारा , हिन्दी साहित्य मे न केवल ‘भावपक्ष’ के कारण बल्कि 'शिल्पपक्ष’ के कारण भी विशेष महत्व रखता है। संत काव्यधारा मे कवि निर्गुण ब्रह्म के प्रति आस्था रखते थे।

                    “जो विधुडे हे पियारे से भटकते दर-बदर फिरते।

                     हमारा यार है हममे हमन को इन्तजारी क्या।।”

        निर्गुण ब्रह्म में आत्मा के विलयन को इन्होंने जीव का अंतिम लक्ष्य माना तथा इसके लिए भक्ति मार्ग को अपनाया। इस धारा ने जाति-पाति भेदभाव से परे सबके लिए भक्ति का मार्ग प्रशस्त किया।

                    “जाति - पाति पूछे नहीं कोई।

                     हरि का भजे सो हरि का होई।।”

        अनुभव की प्रामाणिकता , सामाजिक कुरितियो का विरोध तथा आडम्बरो पर तार्किक प्रश्न के माध्यम से इस धारा के कवियों ने सदियों से उपेक्षित दलित समाज के अन्दर आत्मविश्वास भरा तथा समाज मे करुणा, दया, प्रेम जैसे सात्विक मूल्यों को बढ़ाया । 

        इस प्रकार संतकाव्य धारा के कवियों ने प्रचलित शास्त्रीय प्रतिमानों की अपेक्षा करते हुए नई धारा में काव्य रचा, जिसने आगे चलकर 'मुक्तक छंद', स्वच्छद काव्य जैसी काव्यधारा का विकास किया ।

खुसरो की काव्य भाषा (टिप्पणी)

 खुसरो की काव्य भाषा (टिप्पणी) 

उत्तर

        उन्नीसवीं सदी से पूर्व हिंदी भाषा एवं साहित्य की विकास यात्रा में खुसरो की रचनाएं एक महत्वपूर्ण प्रस्थान बिंदु है। उनकी हिंदी रचनाएं काफी लोकप्रिय रही है। उनकी पहेलियां, मुकरियां, दो सुकने अभी तक लोगों की जुबां पर है।

        अमीर खुसरो ने हिंदी के विविधोन्मुखी भाषिक स्वरूप को अलग पहचान करके ब्रज और कौरवी में पृथक–पृथक रचनाएं की। हालांकि उनकी हिंदी कविता में खड़ी बोली के साथ-साथ दूसरी बोलियों के शब्द भी मिलते हैं। जैसे–

                        सारी रैन मोरे संग जाना, भोर भये बिछड़न लागा।

                        जाके बिछड़े फाटत हियां ऐ सखि साजन ना सखि दिया।।

        अमीर खुसरो द्वारा रचित काव्य न केवल भाव की दृष्टि से बल्कि शिल्प की दृष्टि से भी उत्कृष्ट और विविध है। इन के काव्य में ब्रज भाषा तथा खड़ी बोली दोनों के ही आरंभिक लक्षण दिखाई पड़ते हैं। उदाहरण– 

                        मेरा मोसे सिंगार रावत, आगे बैठके मान बढ़ावत।

                        वासे चिक्कन ना कोउ दीसा, ए सखी साजन।।

        इस प्रकार ब्रजभाषा, अवधी, कन्नौजी आदि अनेक बोलियों का रंग उनकी रचनाओं में मिलता है। अमीर खुसरो ने अपनी फारसी रचनाओं में भी हिंदी शब्दों का प्रयोग किया है, जैसे–

                        सुखनशान मार-मार सब बसर मार।

                        बरावी गुफत है तीर मारा।।

        ठेठ खड़ी बोली का उदाहरण–

                        एक थाल मोती से भरा सबके सिर औंधा धरा।

                        चारों और वह थाल फिरे, मोती उससे एक ना गिरे।।

इस प्रकार गुणों की दृष्टि से अमीर खुसरो की भाषा में प्रसाद एवं माधुर्य का अतिरेक है।

Join Telegram

खुसरो की कविता के आधार पर उनकी लोक चेतना पर संक्षिप्त निबंध लिखिए।

 खुसरो की कविता के आधार पर उनकी लोक चेतना पर संक्षिप्त निबंध लिखिए।

उत्तर

        अमीर खुसरो खड़ी बोली हिंदी और उर्दू के प्रथम कवि माने जाते हैं। वे एक प्रमुख कवि होने के साथ-साथ गायक व संगीतकार भी थे, जिनकी लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण उनकी रचनाएं हैं, जो उनके जीवन दर्शन की झलक देती है। उनकी कविताओं में विषय वैविध्य भी पर्याप्त मात्रा में है।

         ज्ञानमूलक साहित्य (पहेलियां, मुकरिया आदि) से लेकर सामाजिक समस्याओं पर चोट करने तक की सारी अंतर्वस्तु उनके काव्य में विद्यमान है। 

        खुसरो की कविताओं में लोक चेतना के कई तत्व दिखते हैं जो उनकी अनुभवशील भावनात्मक समाज का परिचायक है। देश–प्रेम, भक्ति, समाज आदि से जुड़े तत्वों के साथ-साथ प्रेम व विरह की सूफी वेदना भी दिखती हैं।

        लोगों के मनोरंजन की विषय वस्तु उनकी पहेलियों में दिखती है जो आज भी प्रचलित है जैसे –

                        ना मारा ना खून किया।

                        बीसो का सर काट दिया।। 

        खुसरो समाज के प्रति भी गहरी संवेदना रखते हैं जो विविध रूपों में उनके साहित्य में दिखती हैं।जैसे वे अपने एक गीत में पाखंडी साधु के चरित्र का पर्दाफाश किस प्रकार करते हैं–

                        उज्जल बरन, अधीन तन, एक चित दो ध्यान।

                        देखत में तो साधू है, निपट पाप की खान।।

        खुसरो का एक विशेष योगदान उन कविताओं के कारण भी हैं जिनमें उन्होंने प्रेम के मार्ग पर बल दिया। उनकी बहुत सी कविताएं प्रेम को जीवन का सार तत्व बताती है। जैसे–

                        खुसरो दरिया प्रेम का उल्टी वाकी धार।

                        जो उतरा सो डूब गया जो डूबा सो पार।।

        इसके अलावा अमीर खुसरो ने अपने समय में स्त्री की स्थिति को चिंता का विषय मानते हुए एक साधारण घर की बेटी के दर्द को आवाज दी। उनकी कविताओं का हिंदी साहित्य में बाल साहित्य के रूप में विशेष महत्वपूर्ण योगदान है। बच्चों की कोमल जिज्ञासाओं को जो आनंदपूर्ण शांति खुसरो की कविताओं से मिलती है, वह अतुलनीय है।

Join Telegram

रहीम की कविता के मर्म का उद्घाटन कीजिए एवं उसकी लोकप्रियता के कारणों का निर्देश कीजिए।

 रहीम की कविता के मर्म का उद्घाटन कीजिए एवं उसकी लोकप्रियता के कारणों का निर्देश कीजिए।

उत्तर

        रहीम अर्थात अब्दुल रहीम खानखाना अकबर के प्रसिद्ध दरबारी सहयोगी तथा सेनापति थे। किंतु उनकी प्रसिद्धि का मूल आधार उनका साहित्य है। रहीम हिंदी साहित्य के भक्ति काल की कृष्ण काव्य धारा के कवियों में प्रमुख माने गए हैं।

        रहीम कविता पारखी थे। जीवन की कठोर सच्चाई उनके दोहो में दिखाई देती है, जैसा कि हमें कबीर के दोहों में दिखाई देती है। इसके साथ ही उनकी समकालीन कवियों के साथ अच्छी बनती थी।

उनकी लोकप्रियता के कारण 

  • रहीम की रचनाओं में सर्वाधिक प्रचलित उनके दोहे ही हैं जो राजनीति, समाज, नैतिकता आदि से जुड़े हुए हैं 

                     एक साधे सब सधे, सब साधे सधि जाए।

                    रहिमन मुलहिं सिंचिबो,  फूले–फले अघाय।।

  • रहीम की रचनाओं में मार्मिक व्यथा भी दिखती है पर वे इसे किसी से बांटने से बचते हैं—

                    रहिमन निजमन की व्यथा, मनहीं राखो गोय।

                     सुनी उठ लिहै सब लोग, बाटे ना लिये कोय।।


  • उनकी दानशीलता का गुण काफी चर्चित था पर वे उनका श्रेय लेने से बचते थे। जब भी वे दान देते थे अपनी आंखें नीचे कर लेते थे–

                     देन हार कोई और है, भेजत सो दिन रेन।

                    लोग भरम हम पर धरे, याते नीचे नैन।।


  • रहीम दोहे के साथ-साथ सोरठे, बरवे, मंदनालुक आदि के लिए भी जाने जाते हैं। वस्तुतः उनकी लोकप्रियता का मूल कारण उसमें निहित व्यथा थी।
  •  वे जिन बातों से पीड़ित होते थे उसे अपनी रचना का रूप देते थे जो कि साधारण बोलचाल की भाषा होती थी।
  •  वे जिंदगी भर जीवन के उतार-चढ़ावो को झेलते रहे जिसमें उनके बाल्यावस्था में पिता की मृत्यु होने पर दीनता का अनुभव उनकी कविताओं में देख सकते हैं।
  • उनका भक्ति रस सांप्रदायिक नहीं था। वे मुसलमान होकर भी कृष्ण भक्त थे यह सब उनकी लोकप्रियता में चार चांद लगाते हैं।

खुसरो की कविता की विशेषताएं।

 खुसरो की कविता की विशेषताएं।

उत्तर

        अमीर खुसरो जिन का वास्तविक नाम अबुल फजल था। ये एक महान कवि, सूफी संत व संगीतज्ञ के साथ-साथ अन्य विधाओं के अविष्कारक के रूप में गिने जाते हैं। 14 शताब्दी के आरंभ में वे जिस भाषा का प्रयोग कर रहे थे, वह खड़ी बोली आधुनिक काल में दिखाई देती है।

  • खुसरो की रचनाएं अवधी तथा ब्रजभाषा में भी दिखाई देती है किंतु उनकी कविताओं में लिखित खड़ी बोली आज की खड़ी बोली के इतने अधिक निकट हैं कि आश्चर्य में डाल देती है।

  • खुसरो साहित्य में एक शैली वह हैं जिनमें खड़ी बोली एकदम आधुनिक व शुद्ध रूप में दिखती है। उदाहरण– 

                    एक थाल मोती से भरा सबके सिर औंधा धरा।

                     चारों और वह थाल फिरे मोती उनमें एक ना गिरे।।

  • खुसरो की में कविताओं में दूसरा प्रयोग वहां दिखता है जहां वे खड़ी बोली और ब्रजभाषा के आरंभिक रूपों को मिला देते हैं जैसे–

                     खुसरो दरिया प्रेम का, उल्टी वाकी धार।

                    जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार ।।

            उपरोक्त उदाहरण में वाकी शब्द ब्रजभाषा का है जबकि शेष सारा ढांचा खड़ी बोली का है।

  • इन शैलीयो के अलावा खुसरो ने ऐसी अन्य रचनाएं भी लिखी है जिनमें खड़ी बोली,  ब्रजभाषा और फारसी एक ही प्रवाह में शामिल हो गई–

                     गोरी सोवे सेज पर मुख पर डारे केस।

                    चल खुसरो घर आपने रैन भई चहुं देश।।

कुल मिलाकर यह मानना पड़ता है कि आमिर खुसरो भाषिक प्रयोगों के द्वारा अपने समय और भविष्य की भाषिक प्रवृत्तियों का सुंदर समन्वय स्थापित कर चुके थे।

उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ी बोली की प्रतिष्ठा के प्रमुख कारण क्या थे? स्पष्ट कीजिए।

 उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ी बोली की प्रतिष्ठा के प्रमुख कारण क्या थे? स्पष्ट कीजिए।

 उत्तर

        खड़ी बोली हिंदी भारत की सबसे अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा है। व्यवहार में यह उस भू-भाग की भाषा मानी जाती है जिसकी सीमा पश्चिम में जैसलमेर, उत्तर पश्चिम में अंबाला, उत्तर में शिमला से लेकर नेपाल के पूर्वी छोर तक के पहाड़ी क्षेत्र, पूर्व में भागलपुर, दक्षिण पूर्व में रायपुर खंडवा तक पहुंचती है।

         19वीं शताब्दी में खड़ी बोली में अचानक तेजी से महत्वपूर्ण परिवर्तन होने लगते हैं और यह देखते ही देखते पूरे हिंदी प्रदेश की संपर्क भाषा के रूप में स्थापित हो जाती है। खड़ी बोली का विकास अपने आप में एक आयामी का स्वायत घटना न हो पर ब्रजभाषा के पतन से संबंधित है।

         भारतेंदु पूर्व युग में खड़ी बोली के विकास में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका फोर्ट विलियम कॉलेज की रही। इस कॉलेज के प्रिंसिपल गिलक्रिस्ट द्वारा हिंदी व्याकरण तथा शब्दकोश का निर्माण किया गया, जिसके सहायक थे इंशा अल्लाह खान, लल्लू लाल, सदल मिश्र, सदासुख लाल।

         इंशा अल्लाह खान उर्दू भाषा के अच्छे विद्वान थे इसलिए उनकी भाषा में वाक्य विन्यास पर फारसी का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है। लल्लू लाल की भाषा में उस काल की सारी विशेषताएं जैसे गद्य में लय और तुक का प्रयोग, अलंकारो, लोकोक्तियां और मुहावरे का अधिक प्रयोग आदि। इसके अलावा ईसाई मिशनरियों द्वारा बाइबिल का अनुवाद तथा पत्र-पत्रिकाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

         भारतेंदु युग अथवा 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में खड़ी बोली हिंदी की दो शैलियों का विकास हुआ जो राजा शिवप्रसाद सितारे हिंद और राजा लक्ष्मण सिंह के द्वारा किया गया।

         राजा शिव प्रसाद ने हिंदी का गंवारूपन दूर कर उसे उर्दू–ए–मुअल्ला बना दिया तो राजा लक्ष्मण सिंह ने विशुद्ध संस्कृतनिष्ट हिंदी का समर्थन किया।

        हिंदी सही मायने में भारतेन्दु युग में "नई चाल में ढली" और उसके समय में हिंदी के गद्य का बहुमुखी रूप का सूत्रपात हुआ।

         सौभाग्य से 1903 में आचार्य द्विवेदी ने सरस्वती पत्रिका का संपादन संभाला। उन्होंने हिंदी के परिष्कार का बीड़ा उठाया और उसे बखूबी रूप प्रदान किया।

साहित्यिक भाषा के रूप में अवधी के महत्व का आकलन कीजिए।

 साहित्यिक भाषा के रूप में अवधी के महत्व का आकलन कीजिए।

 उत्तर

       प्राचीन अयोध्या राज्य तथा इसके आसपास के क्षेत्र में बोली जाने वाली ‘बोली’ को अवधी कहा जाता है। इस बोली का साहित्य अत्यंत संपन्न है। अवधी साहित्य लगभग 5 शताब्दियों यथा चौथी सदी से 19वीं सदी तक विभिन्न रचनाकारों द्वारा रचा जाता रहा।

     अवधि में किसी संपूर्ण काव्य रचना का प्रथम उदाहरण 1379 ईस्वी में मौलाना दाऊद की रचना चंदायन है। मौलाना दाऊद को काव्यभाषा या साहित्य की भाषा के रूप में अवधी को प्रतिष्ठित करने का श्रेय दिया जाता है।

    मुल्ला दाऊद के बाद कुतुबन ने 1503 ईस्वी में मृगावती की रचना की। भाषा, काव्य और काव्यरूप की दृष्टि से यह चंदायान की परंपरा की ही कड़ी है।

    अवधी साहित्य के क्षेत्र में सर्वाधिक अवदान मलिक मोहम्मद जायसी का है। जायसी के काव्य प्रतिभा अत्यंत उर्वर और आध्यात्मिक साधना संपन्न थी। जायसी ने अवधी में 14 ग्रंथों की रचना की थी, इसमें सबसे प्रमुख पद्मावत जिसकी रचना 1527 से 1540 ईसवी के बीच हुई। जायसी ने अपने ग्रंथों में बोलचाल की अवधी को साहित्यिक भाषा के उत्कर्ष पर पहुंचा दिया।

    सूफी कवियों के बाद रामभक्त कवियों ने  अवधी भाषा में काव्य रचना की।  इसमें सबसे प्रमुख तुलसीदास है इन्होंने पार्वती मंगल, जानकी मंगल और रामलला नहच्छू नामक तीन काव्य कृतियों की रचना अवधी भाषा में की। लेकिन उनका रामचरितमानस अवधी भाषा की एक महत्वपूर्ण कृति है। उदा. 

तुम्ह पूछहूं मैं कहत डेराऊं 

धरेहूं मोर घरफोरी नाऊं।

सजी प्रतीति बहूविध गढी छोली 

अवध साढ़साती तव बोली।।

    गोस्वामी तुलसीदास के बाद अगली कड़ी में स्वामी अग्रदास तथा नाभादास की वर्णन शैली में अवधी को देखा जा सकता है। नाभादास का अष्टायाम,  रामचरितमानस की दोहा चौपाई में ही लिखा गया है हालांकि रामचरितमानस पर आधारित लिखी गई किसी भी रचना ने रामचरितमानस का स्थान नहीं लिया।

     वस्तुतः रामचरितमानस की अवधी के काव्य का शिखर है। आगे चलकर बीसवीं शताब्दी में काव्य भाषा के रूप में खड़ी बोली ने अवधी का स्थान ग्रहण किया। लेकिन अवधी भाषा की श्रेष्ठ रचनाएं हमेशा खड़ी बोली के रचनाकारों को प्रेरणा देती रही।

मध्यकाल में काव्य भाषा के रूप में अवधी का विकास (टिप्पणी)

 मध्यकाल में काव्य भाषा के रूप में अवधी का विकास (टिप्पणी)

उत्तर 

    अवधी जैसा कि नाम से ही विदित हैं अवध क्षेत्र की भाषा है। यह अयोध्या से निकला हुआ शब्द है जिसका मुख्य क्षेत्र लखनऊ–फैजाबाद का है। मध्यकालीन आर्य भाषाओं के उद्गम के समय की भाषाओं में अवधी के उद्गम पर विवाद है ।

    भाषा के रूप में अवधि का पहला स्पष्ट उल्लेख अमीर खुसरो की रचना खालिकबारी में मिलता है। खुसरो का समय 1253 से 1325 ईस्वी माना जाता है। अर्थात तेरहवीं सदी के अंत तक अवधी एक भाषा के रूप में स्थापित हो चुकी थी।

    पहले रचना जो पूर्णत: अवधी में हैं और जिसने अवधी को एक झटके में लोक भाषा के पद से उठाकर साहित्यिक भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, वह मुल्ला दाऊद की चंदायन या लोरकहा है। 

    इसी परंपरा में अगली रचना को कुतुबन की मृगावती है जिसकी रचना 1503 में हुई। किंतु सूफी प्रेमाख्यानो की इस समूची परंपरा को सबसे अधिक समृद्धि प्रदान करने वाले कवि मलिक मोहम्मद जायसी है। जायसी की रचनाएं अपने ठेठपन, देशीपन को खोए बिना, मिठास और लोक संस्कृति को धारण करते हुए कथ्य को व्यक्त करती है।

    मध्यकाल में अवधी के काव्य भाषा के रूप में विकसित करने में रामानंद द्वारा प्रवर्तित रामावत संप्रदाय का महत्वपूर्ण योगदान है। इस संप्रदाय का उत्तर भारत पर इतना प्रभाव पड़ा कि कबीर जैसे निर्गुण कवि भी अपने काव्य में राम कथा प्रसंग को समाविष्ट करने लगे।

    इस प्रकार एक रामकाव्यधारा का ही विकास हो गया जो अवधी में पुष्पित–पल्लवित हुई, जिसके प्रधान कवि तुलसीदास हैं। तुलसीदास की सर्वाधिक प्रमुख कृति रामचरितमानस है जो हिंदी में ही नहीं बल्कि विश्व की सभी भाषाओं में सफलतम व सर्वश्रेष्ठ ग्रंथों में से एक है।

    तुलसी और राम काव्य धारा के कवियों की मूल विशेषता जो इन्हें सूफी कवियों से अलग करती है वह है तत्सम शब्दों का प्रयोग प्रयोग। हालांकि यह तत्सम शब्द अवधी को संस्कृत बनाने की वजह तत्सम शब्दों का अवधी रूप में प्रयुक्त करते हैं जैसे 

                                                    लोचनु जल रहे लोचन कोना

                                                    जैसे परम कृपन कर सोना 

        इस प्रकार मध्यकाल में अवधी महत्वपूर्ण काव्य भाषा के रूप में प्रतिष्ठित हुई।

सूफी कवियों द्वारा प्रयुक्त अवधी के स्वरूप पर विचार कीजिए।

सूफी कवियों द्वारा प्रयुक्त अवधी के स्वरूप पर विचार कीजिए। 

 उत्तर

        भाषा के रूप में अवधी का पहला स्पष्ट उल्लेख अमीर खुसरो की रचना ‘खलीकबारी’ में मिलता है। इस रचना में अमीर खुसरो अपने समय की भाषाओं का जिक्र करते हुए अवधी भाषा का भी उल्लेख करते हैं। 

        साहित्यिक भाषा के रूप में अवधी के तीव्र विकास का संबंध एक सुयोग से है। भारत की विभिन्न लोक भाषाओं में संस्कृत परंपरा से ही विकसित प्रेमकथाओं को रचने की प्रवृत्ति काफी अधिक व्याप्त थी। ऐसी प्रेम कथाओं में उर्वशी–पुरुरवा आख्यान, उषा–अनिरुद्ध कथा, मालती–माधव कथा आदि काफी प्रचलित थी।

 विभिन्न सूफी कवियों द्वारा अवधी का प्रयोग

  • मौलाना दाऊद— 1379 ईस्वी में मौलाना दाऊद ने ‘चंदायन’ की रचना की। जिसकी भाषा पूर्वी हिंदी या अवधी मानी जा सकती है। गोपाल राय के शब्दों में मौलाना दाऊद का सबसे अधिक महत्व इस बात से है कि उन्होंने एक बोलचाल की भाषा को अपनी सृजनात्मक प्रतिभा से श्रेष्ठ काव्य भाषा का रूप दे दिया।

दाऊद कवि जो चांदा गाई।
जेई रे सुना सो गा मुरझाई।। 

  • मलिक मोहम्मद जायसी— सूफी प्रेमाख्यान की समूची परंपरा को सबसे अधिक समृद्धि प्रदान करने वाले कवि जायसी है। जिन्होंने ठेठ अवधी का प्रयोग करते हुए 14 ग्रंथों की रचना की। जिसमें पद्मावत (1527–1540) सबसे महत्वपूर्ण है।

यह तन जारौ छार के कहौ कि पवन उडाव।
मकु त्तेही मारग उडि परै कन्त धरै जहं पाँव।। 

  • मंझन— जनसाधारण की बोली को अपनाकर उन्होंने सजीव और प्रभावशाली काव्यो की रचना की। साहित्य और भाषा की दृष्टि से इन का अपना महत्व है। मंजन की अवधी अधिक सरल और सटीक है।
  • उस्मान— जायसी के बाद उस्मान का नाम लिया जाता है। इनकी रचना ‘चित्रावली’ पद्मावत के आधार पर ही है।

    सूफी काव्य परंपरा शताब्दियों तक चलती रही पर भाषा की दृष्टि से बाद के कवियों ने जायसी का ही अनुसरण किया।

ब्रजभाषा की व्याकरणिक विशेषताओं का आकलन कीजिए।

ब्रजभाषा की व्याकरणिक विशेषताओं का आकलन कीजिए।  

उत्तर 

        ब्रजभाषा पश्चिम में हिंदी से विकसित हुई सबसे प्रमुख बोली है। जिसका भौगोलिक संबंध ब्रजमंडल या ब्रज प्रदेश से है हालांकि इसके आरंभिक संकेत अमीर खुसरो (आदिकाल) के समय में ही दिखने लगते हैं किंतु इसका वास्तविक विकास भक्तिकाल की कृष्णकाव्य धारा में हुआ।

        ब्रज भाषा में बिहारी जैसे कवियों ने कलात्मक चमत्कार किए तो घनानंद ने इसे हृदय की गहराइयों से जोड़ा। यही कारण था कि भारतेंदु युग भी कविताओं में ब्रजभाषा के मोह से मुक्त नहीं हो पाया।

 ब्रजभाषा की व्याकरणिक विशेषताएं 

  • संज्ञा का पर्यायः एक ही रूप विद्यमान— आकारांत। जैसे ठिकानों, बानो, चारों, दोनों, टीको आदि।
  •  अकारांत, इकारांत, उकारांत पुल्लिंग स्त्रीलिंग संज्ञाए प्रायः यथावत रहती है। जैसे मन, बन, हरि, ग्वाल आदि।
  •  विशेषण पद अधिकतर विशेष्य (संज्ञा के अनुसार) जैसे बढ़ो, निकों, प्यारों, न्यारो, खरी, छोरी आदि।
  •  जातिवाचक और भाववाचक संज्ञा पदों के बहुवचन रूपों के अंत में प्रायः ‘न’ परसर्ग जोड़ने की प्रवृत्ति जैसे दिनन, सखियन (सखीन) छोरान>छोरीन।
  •  स्त्रीलिंग के लिए ई, इया, आईन तथा आनी प्रत्यय। जैसे गौरी, ललाईन, देवरानी, बिटिया।
  •  कही नपुसंकलिंग का प्रयोग भी। जैसे सोना>सोनो।
  • वचन व्यवस्था में देखें तो एं, अन, इन प्रत्यय का प्रयोग। जैसे किताब>किताबें किताबन, रोटी>रोटीन
  • क्रिया व्यवस्था में 
    • वर्तमान काल के लिए ‘त’ रूप — करत, उठत 
    • भूतकाल के लिए ‘औ’ तथा ‘न’ रूप जैसे कियौ, लीना, दिनी
    • भविष्य काल के लिए ‘ग’ तथा ‘ह’ रूप जैसे करैगो, करिहै, मरिहै
  •  कारक व्यवस्था में निर्विभक्तिक प्रयोग नहीं के बराबर हुआ।
  •  विशेष्य विशेष्यानुसार विकारी होते हैं। जैसे कालो छोरो, काली छोरी, काले छोरे।

UPSC PRELIMS EXAM 2026 PAPER -II (CSAT)

UPSC PRELIMS EXAM 2026 PAPER -I (General Studies)   1. परीक्षा का परिचय और महत्व UPSC Prelims क्या है?:  यह सिविल सेवा परीक्षा (CSE) का पहला...