संत साहित्य की विशेषताएं (टिप्प्णी)
उत्तर–
संत साहित्य के प्रवर्तक कवि कबीरदास है । संत कवियों की भाषा को सामान्यतः सधुक्कड़ी या पंचमेलखिचड़ी कहते हैं।जिसका अर्थ होता है — साधुओं की भाषा यानी ऐसी भाषा जो कई स्थानों की भाषाओं के संयोग से बनी हो।
अधिकांश संत कवि निम्न वर्णं तथा निम्न वर्ग से थे। उनकी रचनाएं आर्थिक , सामाजिक असमानता के विरुद्ध एक संघर्ष है । संत साहित्य सिद्ध - नाथो के साहित्य से प्रभावित है । प्रमुख संत कवि कबीरदास, रैदास, सुन्दरदास, मलूकदास आदि है।
संत साहित्य की विशेषताए
(i) निर्गुण ब्रह्म — निर्गुण ब्रह्म का अर्थ है ब्रह्म का कोई रूप नहीं है, कोई आकार " नही है। इसके साथ ही अवतारवाद का विरोध -
“दसरथ सुत तिहुँ लोक बखाना।
राम नाम का मरम है आना ।।”
(ii) प्रेम पर बल— ज्ञानमार्गी संतो का काव्य ज्ञान से अधिक प्रेम पर बल देता -
“ढाई आखर प्रेम का , पढ़े सो पंडित होय।”
(iii) रूढ़ियों व आडवंरो का विरोध- संतों ने रूढ़ियों तथा बाह्य आडम्बरो का विरोध किया है। साथ ही अन्तर्साधना पर बल दिया है-
“पाहन पूजे हरि मिलै, तो मै पूंजू पहाड़।
ताते यह चाकी भली, पीस खाय संसार।।”
(iv) रहस्यवाद की अभिव्यक्ति - संतो ने भारतीय अद्वैतवाद तथा सूफी दर्शन को मिलाकर रहस्यवाद की सृष्टि की। जिसमें आत्मा तथा परमात्मा मिलकर एकाकार होते हैं।
“दुलहीनी गावहु मंगलाचार,
हमारे घर आये हो राजा राम भरतार।।”
(v) गुरु की महिमा — संत साहित्य में ईश्वर से भी ऊंचा दर्जा गुरु को प्रदान किया है। क्योंकि गुरु ही ईश्वर प्राप्ति का मार्ग दिखाता है। जैसे
“गुरु गोबिन्द दोउ खड़े , काके लागू पांयु।
बलिहारी गुरु आपनो , गोबिंद दियो मिलाय।।”
इसके अलावा संत काव्य में अनुभूति की प्रामाणिकता पर बल दिया गया । सतें कवि सुन्दरबस छंद ज्ञान से परिचित थे । संत प्राय आम भाषा का प्रयोग करते थे ।जिससे वह सामान्य शब्दावलियों में भी बड़ी से बड़ी बात कहते थे।
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