हिन्दी भाषा के मानकीकरण में नागरी लिपि के योगदान को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर –
भाषा के मानकीकरण का अभिप्राय है उसका बोली रूप से क्रमश : विकसित होकर एक ऐसी परिनिष्ठित भाषा का रूप धारण कर लेना जो धर्म , शिक्षा , साहित्य एवं प्रशासनिक कार्यकलाप में सर्वमान्य माध्यम बन सके। हिन्दी भाषा के मानकीकरण से तात्पर्य है खड़ी बोली से विकसित और नागरी लिपि में लिखी जाने वाली उस मानक भाषा से है जिसे उच्च हिन्दी या परिनिष्ठित हिन्दी भी कहा जाता है।
हिन्दी भाषा के मानकीकरण में देवनागरी लिपि का योगदान
- देवनागरी लिपि में ध्वनि को व्यक्त करने के लिए एक चिन्ह का प्रयोग तथा प्रत्येक चिन्ह से एक ही ध्वनि का बोध होता है।
- नागरी लिपि में मात्रा एवं वर्ण बोधक चिन्ह इतने भिन्न है कि किन्ही दो चिन्हों के स्वरूप में परस्पर कोई भ्रम नहीं है।
- नागरी लिपि के चिन्ह सुन्दर और कलात्मक होने के साथ - साथ आधुनिक लेखन और मुद्रण के यांत्रिक साधनों के लिए सरलता से अपनाये गये है।
- देश की अधिकांश जनता नागरी लिपि से परिचित थी तथा इसका अन्य लिपियो साथ घनिष्ठ संबंध था, इसलिए हिन्दी के मानकीकरण को बल मिला।
- नागरी लिपि के लेखन और उच्चारण एकरूपता, सुस्पष्टता है तथा किसी भी प्रकार की भ्रांति नहीं है।
- नागरी लिपि भारत की स्वदेशी लिपि है तथा देश के जातीय जीवन, संस्कृति और इतर लिपियों से संस्कारतः जुड़ी हुई है।
- नागरी लिपि में आधुनिक यांत्रिक लेखन की सुविधाओं का उपयोग कर पाने की क्षमता भी विद्यमान थी।
- नागरी लिपि में प्रत्येक अक्षर शिरोरेखा से युक्त है जो हिन्दी को एक अलग पहचान देता है।
इस प्रकार हिन्दी भाषा के मानकीकरण में देवनागरी लिपि ने विशिष्ट भूमिका निभाई , इसके साथ - साथ पर्याप्त मात्रा में साहित्य , समाचार पत्र तथा पोस्टर इत्यादि में देवनागरी लिपि के प्रयोग ने देश के जनमानस में इसको लोकप्रिय बना दिया।
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