ब्रजभाषा की व्याकरणिक विशेषताओं का आकलन कीजिए।
उत्तर
ब्रजभाषा पश्चिम में हिंदी से विकसित हुई सबसे प्रमुख बोली है। जिसका भौगोलिक संबंध ब्रजमंडल या ब्रज प्रदेश से है हालांकि इसके आरंभिक संकेत अमीर खुसरो (आदिकाल) के समय में ही दिखने लगते हैं किंतु इसका वास्तविक विकास भक्तिकाल की कृष्णकाव्य धारा में हुआ।
ब्रज भाषा में बिहारी जैसे कवियों ने कलात्मक चमत्कार किए तो घनानंद ने इसे हृदय की गहराइयों से जोड़ा। यही कारण था कि भारतेंदु युग भी कविताओं में ब्रजभाषा के मोह से मुक्त नहीं हो पाया।
ब्रजभाषा की व्याकरणिक विशेषताएं
- संज्ञा का पर्यायः एक ही रूप विद्यमान— आकारांत। जैसे ठिकानों, बानो, चारों, दोनों, टीको आदि।
- अकारांत, इकारांत, उकारांत पुल्लिंग स्त्रीलिंग संज्ञाए प्रायः यथावत रहती है। जैसे मन, बन, हरि, ग्वाल आदि।
- विशेषण पद अधिकतर विशेष्य (संज्ञा के अनुसार) जैसे बढ़ो, निकों, प्यारों, न्यारो, खरी, छोरी आदि।
- जातिवाचक और भाववाचक संज्ञा पदों के बहुवचन रूपों के अंत में प्रायः ‘न’ परसर्ग जोड़ने की प्रवृत्ति जैसे दिनन, सखियन (सखीन) छोरान>छोरीन।
- स्त्रीलिंग के लिए ई, इया, आईन तथा आनी प्रत्यय। जैसे गौरी, ललाईन, देवरानी, बिटिया।
- कही नपुसंकलिंग का प्रयोग भी। जैसे सोना>सोनो।
- वचन व्यवस्था में देखें तो एं, अन, इन प्रत्यय का प्रयोग। जैसे किताब>किताबें किताबन, रोटी>रोटीन
- क्रिया व्यवस्था में
- वर्तमान काल के लिए ‘त’ रूप — करत, उठत
- भूतकाल के लिए ‘औ’ तथा ‘न’ रूप जैसे कियौ, लीना, दिनी
- भविष्य काल के लिए ‘ग’ तथा ‘ह’ रूप जैसे करैगो, करिहै, मरिहै
- कारक व्यवस्था में निर्विभक्तिक प्रयोग नहीं के बराबर हुआ।
- विशेष्य विशेष्यानुसार विकारी होते हैं। जैसे कालो छोरो, काली छोरी, काले छोरे।