स्वतवता संग्राम की अवधि मे हुए हिन्दी के विकास का परिचय दीजिए।
स्वतंत्रता संग्राम की अवधि (1857-1947) में हिंदी एक बोली से निकलकर सम्पूर्ण राष्ट्र की संपर्क भाषा और राष्ट्रीय चेतना का सबसे सशक्त माध्यम बनी। इसने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जन-जन को एकजुट करने में अद्वितीय भूमिका निभाई।स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हिंदी के विकास को प्रमुख चरणों और क्षेत्रों में इस प्रकार समझा जा सकता है:-
1. भाषा का राष्ट्रीयकरण और संपर्क भाषा के रूप में उदय
जनता की भाषा: राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं (जैसे बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी और सुभाष चंद्र बोस) ने यह स्पष्ट रूप से समझ लिया था कि विदेशी भाषा (अंग्रेजी) के माध्यम से आम जनता को स्वतंत्रता संग्राम से नहीं जोड़ा जा सकता।
महात्मा गांधी का योगदान: महात्मा गांधी ने हिंदी को "जनमानस की भाषा" कहा। उनके अनुसार, "यदि हम भारत को एक राष्ट्र के रूप में देखना चाहते हैं, तो हिंदी ही एकमात्र ऐसी भाषा है जो देश के विभिन्न हिस्सों को जोड़ सकती है।"
"राष्ट्रभाषा का प्रचार: दक्षिण भारत में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए सी. राजगोपालचारी और एनी बेसेंट जैसे नेताओं ने 'दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा' की स्थापना की, जिससे हिंदी राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत हुई।
2. साहित्यिक चेतना और देशभक्तिपूर्ण साहित्य
इस काल के साहित्य ने लोगों के दिलों में क्रांति और देशभक्ति की ज्वाला भड़काई:भारतेंदु युग: भारतेंदु हरिशचन्द्र ने हिंदी गद्य और नाटकों के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार किया और स्वदेशी का मंत्र दिया।
द्विवेदी युग: महावीर प्रसाद द्विवेदी ने हिंदी भाषा के व्याकरण को परिमार्जित (शुद्ध) किया। इस काल के कवियों ने राष्ट्रप्रेम को अपनी कविताओं का मुख्य विषय बनाया।
वीर रस के कवि: मैथिलीशरण गुप्त (भारत-भारती), माखनलाल चतुर्वेदी (पुष्प की अभिलाषा), रामधारी सिंह 'दिनकर', और रामप्रसाद 'बिस्मिल' जैसे कवियों की रचनाओं ने युवाओं में बलिदान की भावना उत्पन्न की।
3. हिंदी पत्रकारिता की भूमिका
पत्र-पत्रिकाओं ने ब्रिटिश सरकार की नीतियों का विरोध करने और जनमानस को जागरूक करने में बहुत बड़ा योगदान दिया:
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