राष्ट्रभाषा हिन्दी के आंदोलन में सेठ गोविन्ददास के योगवान पर विचार कीजिए।
उत्तर
एक साहित्यकार , सांसद व स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ - साथ सेठ गोविन्ददास हिन्दी को भारत की राजभाषा बनाने के प्रबल समर्थक थे । सेठ गोविन्ददास ने हिन्दी के लिए काफी योगदान किया। उन्होंने अंग्रेजी रचनाओं की तर्ज पर हिन्दी में कई रचनाएं की।
वे प्राचीन भारत का देते हुए संस्कृत के कोख से जन्मी हिन्दी को सर्वश्रेष्ठ मानते थे । उनका कहना था कि जब तक भारत के सारे काम - काज हिन्दी में नहीं होगें तब तक हिन्दी पिछड़ी हुई रहेगी ।
सेठ गोविन्ददास मानते थे कि कुछ ऊंचे पदो पर बैठे लोगों की वजह से आज हिन्दी इस दुरावस्था में है । ये वे लोग है जो अंग्रेजी पढ़े हैं । उनका मानना था कि अंग्रेजी एक कमजोर भाषा है जिसमे शब्द निर्माण की क्षमता हिन्दी से काफी कम है।
उन्होने कहा कि यह बड़ी अजीब सी बात है कि हमें अपने ही देश में अपनी ही भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने के लिए लड़ना पड रहा है। यदि यहां पर विदेशियो का राज होता तो अलग बात थी । उन्होंने उदाहरण दिया कि अंग्रेजी के सारे तकनीकी शब्द लातिन या फिर यूनानी हैं । वे कहते थे कि हिन्दी में इतनी विभिन्नताएं है कि इनका शब्द निर्माण क्षमता सबसे अधिक है।
सेठ गोविन्ददास ने हिन्दी भाषा की श्रेष्ठता को परिभाषित करने के लिए कई प्रयास किए। वे सरकारी नौकरी हेतु हिन्दी माध्यम की हमेशा वकालात करते रहे , साथ ही न्यायालय की भाषा हेतु भी । सेठ गोविन्ददास कहते हैं कि अंग्रेजी के हिमायती हिन्दी को शक्तिहीन बताते हैं तथा मौलिक सर्जन के विपरित बताते हैं । उन्होंने तर्क दिया कि किसी भाषा का पर्याय बनने की क्षमता होना या ना होना उसकी कमजोरी नहीं बन सकती ।
कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि सेठ गोविदास ने हिन्दी की विशेषताओं को जागृत करने के साथ साथ हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का जबरदस्त काम किया।
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