खुसरो की काव्य भाषा (टिप्पणी)
उत्तर
उन्नीसवीं सदी से पूर्व हिंदी भाषा एवं साहित्य की विकास यात्रा में खुसरो की रचनाएं एक महत्वपूर्ण प्रस्थान बिंदु है। उनकी हिंदी रचनाएं काफी लोकप्रिय रही है। उनकी पहेलियां, मुकरियां, दो सुकने अभी तक लोगों की जुबां पर है।
अमीर खुसरो ने हिंदी के विविधोन्मुखी भाषिक स्वरूप को अलग पहचान करके ब्रज और कौरवी में पृथक–पृथक रचनाएं की। हालांकि उनकी हिंदी कविता में खड़ी बोली के साथ-साथ दूसरी बोलियों के शब्द भी मिलते हैं। जैसे–
सारी रैन मोरे संग जाना, भोर भये बिछड़न लागा।
जाके बिछड़े फाटत हियां ऐ सखि साजन ना सखि दिया।।
अमीर खुसरो द्वारा रचित काव्य न केवल भाव की दृष्टि से बल्कि शिल्प की दृष्टि से भी उत्कृष्ट और विविध है। इन के काव्य में ब्रज भाषा तथा खड़ी बोली दोनों के ही आरंभिक लक्षण दिखाई पड़ते हैं। उदाहरण–
मेरा मोसे सिंगार रावत, आगे बैठके मान बढ़ावत।
वासे चिक्कन ना कोउ दीसा, ए सखी साजन।।
इस प्रकार ब्रजभाषा, अवधी, कन्नौजी आदि अनेक बोलियों का रंग उनकी रचनाओं में मिलता है। अमीर खुसरो ने अपनी फारसी रचनाओं में भी हिंदी शब्दों का प्रयोग किया है, जैसे–
सुखनशान मार-मार सब बसर मार।
बरावी गुफत है तीर मारा।।
ठेठ खड़ी बोली का उदाहरण–
एक थाल मोती से भरा सबके सिर औंधा धरा।
चारों और वह थाल फिरे, मोती उससे एक ना गिरे।।
इस प्रकार गुणों की दृष्टि से अमीर खुसरो की भाषा में प्रसाद एवं माधुर्य का अतिरेक है।
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