साहित्यिक भाषा के रूप में अवधी के महत्व का आकलन कीजिए।

 साहित्यिक भाषा के रूप में अवधी के महत्व का आकलन कीजिए।

 उत्तर

       प्राचीन अयोध्या राज्य तथा इसके आसपास के क्षेत्र में बोली जाने वाली ‘बोली’ को अवधी कहा जाता है। इस बोली का साहित्य अत्यंत संपन्न है। अवधी साहित्य लगभग 5 शताब्दियों यथा चौथी सदी से 19वीं सदी तक विभिन्न रचनाकारों द्वारा रचा जाता रहा।

     अवधि में किसी संपूर्ण काव्य रचना का प्रथम उदाहरण 1379 ईस्वी में मौलाना दाऊद की रचना चंदायन है। मौलाना दाऊद को काव्यभाषा या साहित्य की भाषा के रूप में अवधी को प्रतिष्ठित करने का श्रेय दिया जाता है।

    मुल्ला दाऊद के बाद कुतुबन ने 1503 ईस्वी में मृगावती की रचना की। भाषा, काव्य और काव्यरूप की दृष्टि से यह चंदायान की परंपरा की ही कड़ी है।

    अवधी साहित्य के क्षेत्र में सर्वाधिक अवदान मलिक मोहम्मद जायसी का है। जायसी के काव्य प्रतिभा अत्यंत उर्वर और आध्यात्मिक साधना संपन्न थी। जायसी ने अवधी में 14 ग्रंथों की रचना की थी, इसमें सबसे प्रमुख पद्मावत जिसकी रचना 1527 से 1540 ईसवी के बीच हुई। जायसी ने अपने ग्रंथों में बोलचाल की अवधी को साहित्यिक भाषा के उत्कर्ष पर पहुंचा दिया।

    सूफी कवियों के बाद रामभक्त कवियों ने  अवधी भाषा में काव्य रचना की।  इसमें सबसे प्रमुख तुलसीदास है इन्होंने पार्वती मंगल, जानकी मंगल और रामलला नहच्छू नामक तीन काव्य कृतियों की रचना अवधी भाषा में की। लेकिन उनका रामचरितमानस अवधी भाषा की एक महत्वपूर्ण कृति है। उदा. 

तुम्ह पूछहूं मैं कहत डेराऊं 

धरेहूं मोर घरफोरी नाऊं।

सजी प्रतीति बहूविध गढी छोली 

अवध साढ़साती तव बोली।।

    गोस्वामी तुलसीदास के बाद अगली कड़ी में स्वामी अग्रदास तथा नाभादास की वर्णन शैली में अवधी को देखा जा सकता है। नाभादास का अष्टायाम,  रामचरितमानस की दोहा चौपाई में ही लिखा गया है हालांकि रामचरितमानस पर आधारित लिखी गई किसी भी रचना ने रामचरितमानस का स्थान नहीं लिया।

     वस्तुतः रामचरितमानस की अवधी के काव्य का शिखर है। आगे चलकर बीसवीं शताब्दी में काव्य भाषा के रूप में खड़ी बोली ने अवधी का स्थान ग्रहण किया। लेकिन अवधी भाषा की श्रेष्ठ रचनाएं हमेशा खड़ी बोली के रचनाकारों को प्रेरणा देती रही।

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