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स्वतंत्रता संग्राम की अवधि मे हुए हिन्दी के विकास का परिचय दीजिए।

स्वतवता संग्राम की अवधि मे हुए हिन्दी के विकास का परिचय दीजिए।

    स्वतंत्रता संग्राम की अवधि (1857-1947) में हिंदी एक बोली से निकलकर सम्पूर्ण राष्ट्र की संपर्क भाषा और राष्ट्रीय चेतना का सबसे सशक्त माध्यम बनी। इसने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जन-जन को एकजुट करने में अद्वितीय भूमिका निभाई।

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हिंदी के विकास को प्रमुख चरणों और क्षेत्रों में इस प्रकार समझा जा सकता है:-

1. भाषा का राष्ट्रीयकरण और संपर्क भाषा के रूप में उदय

जनता की भाषा: राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं (जैसे बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी और सुभाष चंद्र बोस) ने यह स्पष्ट रूप से समझ लिया था कि विदेशी भाषा (अंग्रेजी) के माध्यम से आम जनता को स्वतंत्रता संग्राम से नहीं जोड़ा जा सकता।

महात्मा गांधी का योगदान: महात्मा गांधी ने हिंदी को "जनमानस की भाषा" कहा। उनके अनुसार, "यदि हम भारत को एक राष्ट्र के रूप में देखना चाहते हैं, तो हिंदी ही एकमात्र ऐसी भाषा है जो देश के विभिन्न हिस्सों को जोड़ सकती है।"

"राष्ट्रभाषा का प्रचार: दक्षिण भारत में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए सी. राजगोपालचारी और एनी बेसेंट जैसे नेताओं ने 'दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा' की स्थापना की, जिससे हिंदी राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत हुई।

2. साहित्यिक चेतना और देशभक्तिपूर्ण साहित्य

इस काल के साहित्य ने लोगों के दिलों में क्रांति और देशभक्ति की ज्वाला भड़काई:

भारतेंदु युग: भारतेंदु हरिशचन्द्र ने हिंदी गद्य और नाटकों के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार किया और स्वदेशी का मंत्र दिया।

द्विवेदी युग: महावीर प्रसाद द्विवेदी ने हिंदी भाषा के व्याकरण को परिमार्जित (शुद्ध) किया। इस काल के कवियों ने राष्ट्रप्रेम को अपनी कविताओं का मुख्य विषय बनाया।

वीर रस के कवि: मैथिलीशरण गुप्त (भारत-भारती), माखनलाल चतुर्वेदी (पुष्प की अभिलाषा), रामधारी सिंह 'दिनकर', और रामप्रसाद 'बिस्मिल' जैसे कवियों की रचनाओं ने युवाओं में बलिदान की भावना उत्पन्न की।

3. हिंदी पत्रकारिता की भूमिका

पत्र-पत्रिकाओं ने ब्रिटिश सरकार की नीतियों का विरोध करने और जनमानस को जागरूक करने में बहुत बड़ा योगदान दिया:

प्रमुख समाचार पत्र: उदन्त मार्तण्ड (प्रथम हिंदी समाचार पत्र, 1826), प्रताप, कर्मवीर, केसरी (हिंदी संस्करण), और जागरण जैसे पत्रों ने स्वतंत्रता की अलख जगाई।

उद्देश्य: इन पत्र-पत्रिकाओं ने अंग्रेजी शासन के अत्याचारों को उजागर किया और स्वतंत्रता सेनानियों को राष्ट्रीय विचारों से अवगत कराया।

4. संस्थाओं और सम्मेलनों का योगदान

नागरी प्रचारिणी सभा (काशी): इस संस्था ने हिंदी के मानकीकरण और देवनागरी लिपि के प्रचार में बहुत महत्वपूर्ण कार्य किया।

हिंदी साहित्य सम्मेलन: 1910 में स्थापित इस संस्था ने हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित करने के लिए देशभर में आंदोलन और प्रचार कार्य किया।

    स्वतंत्रता संग्राम की इस लंबी अवधि में हिंदी केवल साहित्य का विषय नहीं रही, बल्कि यह एक हथियार बन गई। इसी व्यापक स्वीकार्यता और विकास के परिणामस्वरूप, स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 14 सितंबर 1949 को हिंदी को भारत की राजभाषा का दर्जा प्रदान किया और यह भारतीय संविधान का अभिन्न अंग बनी।edited 01:13 PM

पूर्वी हिंदी और पश्चिमी हिंदी के प्रमुख अंतर।

पूर्वी हिंदी और पश्चिमी हिंदी के प्रमुख अंतर। 

उत्तर:–

विज्ञान और तकनीक की भाषा के रूप में हिंदी का विकास।

विज्ञान और तकनीक की भाषा के रूप में हिंदी का विकास। 

उत्तर:– 

हिंदी भाषा के मानकीकरण में द्विवेदी-युग का योगदान।

हिंदी भाषा के मानकीकरण में द्विवेदी-युग का योगदान। 

उत्तर:–  

           किसी भाषा के बोलचाल के स्तर से ऊपर उठकर मानक रूप ग्रहण कर लेना, उसका मानकीकरण कहलाता है। भारतेन्दु युग में भाषायी द्वेत के बावजूद खड़ी बोली गद्य की भाषा के रूप में स्थापित हो चुकी थी किंतु उसका अभी भी मानक रूप में प्रयोग नहीं हो रहा था। हिंदी के मानकीकरण की दृष्टि से द्विवेदी-युग (1900–1918) महत्वपूर्ण है जिसमें सरस्वती पत्रिका के संपादक के रूप द्विवेदी जी ने इसे एक सक्रिय आंदोलन के रूप में उठाया। 

मानकीकरण में द्विवेदी युग का योगदान

  • विदेशी भाषा के जो शब्द हिंदी में प्रचलित हो गए है, उन्हें उसी रूप में स्वीकार कर लिया जाए। जैसे– अदालत(अरबी), रिक्शा(जापानी) ऑपरेशन(अंग्रेजी), सरकार(फारसी) आदि। 
  • जिन शब्दों का अमानक रूप हिंदी में प्रचलित है, उनका मानक रूप प्रयुक्त किया जाए। जैसे– इस्नें > इसनें, उस्का > उसका आदि। 
  • संज्ञा सही के साथ परसर्ग को सटाकर ना लिखा जाए। जैसे– जीत ने रचना को किताब दी। 
  • सर्वनाम शब्दों के संबंध में परसर्ग को सटाकर लिखा जाए। जैसे– मैने आपको सुबह ही बताया था। (मैं–सर्वनाम, ने–परसर्ग)
  • संस्कृत, फारसी, अरबी आदि भाषाओं के कई पुल्लिंग शब्द जो हिंदी में स्त्रीलिंग के रूप में व्यवहार में होते है, उन्हें स्त्रीलिंग के रूप में स्वीकार किया जाए। जैसे– आत्म, वायु, मर्यादा आदि। 
  • ब्रज भाषा के शब्द जो हिंदी में प्रयोग होते है या क्रिया के अमानक रूप, का प्रयोग बंद किया जाए। जैसे– आवैं, जावैं, लीजे, कीजैं आदि। 
  • कुछ शब्दों के बहुवचन रूप हिंदी में अमानक रूप के प्रयुक्त होते है, उनका मानक रूप में प्रयोग किया जाए। जैसे राजे > राजा (दो राजा, पांच राजा), लड़कियें > लड़कियाँ (दो लड़कियाँ > दस लड़कियाँ) आदि। 
  • केवल आकारंत विशेषणों को विकारी माना जाना चाहिए, शेष विशेषण अधिकारी ही माने जाने चाहिए। जैसे– काला > काली, काले। 
          इस प्रकार द्विवेदी युग में हिंदी में भाषायी अनुशासन को अपनाकर व्याकारणीक त्रुटियों को दूर करते हुए खड़ी बोली को हिंदी के मानक रूप में स्थापित किया। द्विवेदीजी की प्रेरणा से कामता प्रसाद गुरु ने ‘हिंदी व्याकरण’ के नाम से एक वृहद ग्रंथ लिखा। 





           

देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता।

देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता।
उत्तर – 

        देवनागरी लिपि एक वैज्ञानिक लिपि है। विश्व के किसी भी कोने में प्रयुक्त वर्णमाला उतने वैज्ञानिक रुप में वर्गीकृत नहीं है , जितने कि नागरी लिपि वैज्ञानिक रूप में वर्गीकृत है। 

        अन्य लिपियो जैसे उर्दू तथा रोमन लिपि एवं व्यंजन या व्यंजन के वैज्ञानिक वर्ग मिले - जुले रूप में रखे गये हैं। लेकिन देवनागरी लिपि में इस प्रकार की गड़बड़ी नहीं है। इसमें स्वर अलग है और व्यंजन अलग है। 

        समवेततः प्रारम्भ मे मूल स्वर ( अ, आ, इ, ई, उ, ऊ ) और उनके संयुक्त स्वर ( ए , ऐ , ओ , बो ) तथा व्यंजनों का विशेषकर स्पर्श एवं अनुनासिक का विभाजन तो और भी वैज्ञानिक है। 

        क, च, ट, त, प के वर्ग, स्थान पर आधारित के और हर व्यंजन वर्ग के व्यंजन घोषत्व के आधार पर दो प्रकार का होता है - प्रथम दो अघोष तथा अंतिम तीन संघोष। इसके साथ ही इनके वर्गीकरण या विभाजन में प्राणतत्व का भी ध्यान रखा गया है। पहले तीसरे और पांचवें अल्पप्राण है तथा दूसरे , चौथे महाप्राण।

        भाषा की ध्वनियाँ उच्चारण की दृष्टि से विशेषतः परिवर्तित होती रहती है। जिसका आशय यह हुआ कि एक समय में यह विशेषता किसी लिपि में होती है तथा किसी में नहीं। अंग्रेजी में यह गड़बड़ी है जैसे- 'क' ध्वनि के लिए C, K, CH, CK, Q आदि, लेकिन देवनागरी लिपि में इस प्रकार का अवगुण नहीं है। 

        देवनागरी लिपि में स्वर यदि स्वतंत्र रूप आते हैं तो पूरे वर्ण- चिन्ह का प्रयोग होता है जैसे- आग, ईद। किन्तु व्यंजन के साथ ‘अ’ के अतिरिक्त अन्य स्वरो का मात्रा - रूप प्रयोग होता है जैसे नाग, चतुर आदि। 

        इस प्रकार अनेक दृष्टियो से देवनागरी लिपि अत्यन्त वैज्ञानिक लिपि है, तथा उसकी कई विशेषताएं ऐसी हो जो अन्य लिपियों में देखने को नहीं मिलती है।

 

हिन्दी भाषा के मानकीकरण में नागरी लिपि के योगदान को स्पष्ट कीजिए।

 हिन्दी भाषा के मानकीकरण में नागरी लिपि के योगदान को स्पष्ट कीजिए।

 उत्तर – 

        भाषा के मानकीकरण का अभिप्राय है उसका बोली रूप से क्रमश : विकसित होकर एक ऐसी परिनिष्ठित भाषा का रूप धारण कर लेना जो धर्म , शिक्षा , साहित्य एवं प्रशासनिक कार्यकलाप में सर्वमान्य माध्यम बन सके। हिन्दी भाषा के मानकीकरण से तात्पर्य है खड़ी बोली से विकसित और नागरी लिपि में लिखी जाने वाली उस मानक भाषा से है जिसे उच्च हिन्दी या परिनिष्ठित हिन्दी भी कहा जाता है।

 हिन्दी भाषा के मानकीकरण में देवनागरी लिपि का योगदान 

  • देवनागरी लिपि में ध्वनि को व्यक्त करने के लिए एक चिन्ह का प्रयोग तथा प्रत्येक चिन्ह से एक ही ध्वनि का बोध होता है।
  • नागरी लिपि में मात्रा एवं वर्ण बोधक चिन्ह इतने भिन्न है कि किन्ही दो चिन्हों के स्वरूप में परस्पर कोई भ्रम नहीं है। 
  • नागरी लिपि के चिन्ह सुन्दर और कलात्मक होने के साथ - साथ आधुनिक लेखन और मुद्रण के यांत्रिक साधनों के लिए सरलता से अपनाये गये है।
  • देश की अधिकांश जनता नागरी लिपि से परिचित थी तथा इसका अन्य लिपियो साथ घनिष्ठ संबंध था, इसलिए हिन्दी के मानकीकरण को बल मिला।
  • नागरी लिपि के लेखन और उच्चारण एकरूपता, सुस्पष्टता है तथा किसी भी प्रकार की भ्रांति नहीं है।
  • नागरी लिपि भारत की स्वदेशी लिपि है तथा देश के जातीय जीवन, संस्कृति और इतर लिपियों से संस्कारतः जुड़ी हुई है। 
  • नागरी लिपि में आधुनिक यांत्रिक लेखन की सुविधाओं का उपयोग कर पाने की क्षमता भी विद्यमान थी। 
  • नागरी लिपि में प्रत्येक अक्षर शिरोरेखा से युक्त है जो हिन्दी को एक अलग पहचान देता है।

        इस प्रकार हिन्दी भाषा के मानकीकरण में देवनागरी लिपि ने विशिष्ट भूमिका निभाई , इसके साथ - साथ पर्याप्त मात्रा में साहित्य , समाचार पत्र तथा पोस्टर इत्यादि में देवनागरी लिपि के प्रयोग ने देश के जनमानस में इसको लोकप्रिय बना दिया।

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रहीम की कविता के मर्म का उद्घाटन कीजिए एवं उसकी लोकप्रियता के कारणों का निर्देश कीजिए।

 रहीम की कविता के मर्म का उद्घाटन कीजिए एवं उसकी लोकप्रियता के कारणों का निर्देश कीजिए।

उत्तर

        रहीम अर्थात अब्दुल रहीम खानखाना अकबर के प्रसिद्ध दरबारी सहयोगी तथा सेनापति थे। किंतु उनकी प्रसिद्धि का मूल आधार उनका साहित्य है। रहीम हिंदी साहित्य के भक्ति काल की कृष्ण काव्य धारा के कवियों में प्रमुख माने गए हैं।

        रहीम कविता पारखी थे। जीवन की कठोर सच्चाई उनके दोहो में दिखाई देती है, जैसा कि हमें कबीर के दोहों में दिखाई देती है। इसके साथ ही उनकी समकालीन कवियों के साथ अच्छी बनती थी।

उनकी लोकप्रियता के कारण 

  • रहीम की रचनाओं में सर्वाधिक प्रचलित उनके दोहे ही हैं जो राजनीति, समाज, नैतिकता आदि से जुड़े हुए हैं 

                     एक साधे सब सधे, सब साधे सधि जाए।

                    रहिमन मुलहिं सिंचिबो,  फूले–फले अघाय।।

  • रहीम की रचनाओं में मार्मिक व्यथा भी दिखती है पर वे इसे किसी से बांटने से बचते हैं—

                    रहिमन निजमन की व्यथा, मनहीं राखो गोय।

                     सुनी उठ लिहै सब लोग, बाटे ना लिये कोय।।


  • उनकी दानशीलता का गुण काफी चर्चित था पर वे उनका श्रेय लेने से बचते थे। जब भी वे दान देते थे अपनी आंखें नीचे कर लेते थे–

                     देन हार कोई और है, भेजत सो दिन रेन।

                    लोग भरम हम पर धरे, याते नीचे नैन।।


  • रहीम दोहे के साथ-साथ सोरठे, बरवे, मंदनालुक आदि के लिए भी जाने जाते हैं। वस्तुतः उनकी लोकप्रियता का मूल कारण उसमें निहित व्यथा थी।
  •  वे जिन बातों से पीड़ित होते थे उसे अपनी रचना का रूप देते थे जो कि साधारण बोलचाल की भाषा होती थी।
  •  वे जिंदगी भर जीवन के उतार-चढ़ावो को झेलते रहे जिसमें उनके बाल्यावस्था में पिता की मृत्यु होने पर दीनता का अनुभव उनकी कविताओं में देख सकते हैं।
  • उनका भक्ति रस सांप्रदायिक नहीं था। वे मुसलमान होकर भी कृष्ण भक्त थे यह सब उनकी लोकप्रियता में चार चांद लगाते हैं।

खुसरो की कविता की विशेषताएं।

 खुसरो की कविता की विशेषताएं।

उत्तर

        अमीर खुसरो जिन का वास्तविक नाम अबुल फजल था। ये एक महान कवि, सूफी संत व संगीतज्ञ के साथ-साथ अन्य विधाओं के अविष्कारक के रूप में गिने जाते हैं। 14 शताब्दी के आरंभ में वे जिस भाषा का प्रयोग कर रहे थे, वह खड़ी बोली आधुनिक काल में दिखाई देती है।

  • खुसरो की रचनाएं अवधी तथा ब्रजभाषा में भी दिखाई देती है किंतु उनकी कविताओं में लिखित खड़ी बोली आज की खड़ी बोली के इतने अधिक निकट हैं कि आश्चर्य में डाल देती है।

  • खुसरो साहित्य में एक शैली वह हैं जिनमें खड़ी बोली एकदम आधुनिक व शुद्ध रूप में दिखती है। उदाहरण– 

                    एक थाल मोती से भरा सबके सिर औंधा धरा।

                     चारों और वह थाल फिरे मोती उनमें एक ना गिरे।।

  • खुसरो की में कविताओं में दूसरा प्रयोग वहां दिखता है जहां वे खड़ी बोली और ब्रजभाषा के आरंभिक रूपों को मिला देते हैं जैसे–

                     खुसरो दरिया प्रेम का, उल्टी वाकी धार।

                    जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार ।।

            उपरोक्त उदाहरण में वाकी शब्द ब्रजभाषा का है जबकि शेष सारा ढांचा खड़ी बोली का है।

  • इन शैलीयो के अलावा खुसरो ने ऐसी अन्य रचनाएं भी लिखी है जिनमें खड़ी बोली,  ब्रजभाषा और फारसी एक ही प्रवाह में शामिल हो गई–

                     गोरी सोवे सेज पर मुख पर डारे केस।

                    चल खुसरो घर आपने रैन भई चहुं देश।।

कुल मिलाकर यह मानना पड़ता है कि आमिर खुसरो भाषिक प्रयोगों के द्वारा अपने समय और भविष्य की भाषिक प्रवृत्तियों का सुंदर समन्वय स्थापित कर चुके थे।

उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ी बोली की प्रतिष्ठा के प्रमुख कारण क्या थे? स्पष्ट कीजिए।

 उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ी बोली की प्रतिष्ठा के प्रमुख कारण क्या थे? स्पष्ट कीजिए।

 उत्तर

        खड़ी बोली हिंदी भारत की सबसे अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा है। व्यवहार में यह उस भू-भाग की भाषा मानी जाती है जिसकी सीमा पश्चिम में जैसलमेर, उत्तर पश्चिम में अंबाला, उत्तर में शिमला से लेकर नेपाल के पूर्वी छोर तक के पहाड़ी क्षेत्र, पूर्व में भागलपुर, दक्षिण पूर्व में रायपुर खंडवा तक पहुंचती है।

         19वीं शताब्दी में खड़ी बोली में अचानक तेजी से महत्वपूर्ण परिवर्तन होने लगते हैं और यह देखते ही देखते पूरे हिंदी प्रदेश की संपर्क भाषा के रूप में स्थापित हो जाती है। खड़ी बोली का विकास अपने आप में एक आयामी का स्वायत घटना न हो पर ब्रजभाषा के पतन से संबंधित है।

         भारतेंदु पूर्व युग में खड़ी बोली के विकास में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका फोर्ट विलियम कॉलेज की रही। इस कॉलेज के प्रिंसिपल गिलक्रिस्ट द्वारा हिंदी व्याकरण तथा शब्दकोश का निर्माण किया गया, जिसके सहायक थे इंशा अल्लाह खान, लल्लू लाल, सदल मिश्र, सदासुख लाल।

         इंशा अल्लाह खान उर्दू भाषा के अच्छे विद्वान थे इसलिए उनकी भाषा में वाक्य विन्यास पर फारसी का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है। लल्लू लाल की भाषा में उस काल की सारी विशेषताएं जैसे गद्य में लय और तुक का प्रयोग, अलंकारो, लोकोक्तियां और मुहावरे का अधिक प्रयोग आदि। इसके अलावा ईसाई मिशनरियों द्वारा बाइबिल का अनुवाद तथा पत्र-पत्रिकाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

         भारतेंदु युग अथवा 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में खड़ी बोली हिंदी की दो शैलियों का विकास हुआ जो राजा शिवप्रसाद सितारे हिंद और राजा लक्ष्मण सिंह के द्वारा किया गया।

         राजा शिव प्रसाद ने हिंदी का गंवारूपन दूर कर उसे उर्दू–ए–मुअल्ला बना दिया तो राजा लक्ष्मण सिंह ने विशुद्ध संस्कृतनिष्ट हिंदी का समर्थन किया।

        हिंदी सही मायने में भारतेन्दु युग में "नई चाल में ढली" और उसके समय में हिंदी के गद्य का बहुमुखी रूप का सूत्रपात हुआ।

         सौभाग्य से 1903 में आचार्य द्विवेदी ने सरस्वती पत्रिका का संपादन संभाला। उन्होंने हिंदी के परिष्कार का बीड़ा उठाया और उसे बखूबी रूप प्रदान किया।

साहित्यिक भाषा के रूप में अवधी के महत्व का आकलन कीजिए।

 साहित्यिक भाषा के रूप में अवधी के महत्व का आकलन कीजिए।

 उत्तर

       प्राचीन अयोध्या राज्य तथा इसके आसपास के क्षेत्र में बोली जाने वाली ‘बोली’ को अवधी कहा जाता है। इस बोली का साहित्य अत्यंत संपन्न है। अवधी साहित्य लगभग 5 शताब्दियों यथा चौथी सदी से 19वीं सदी तक विभिन्न रचनाकारों द्वारा रचा जाता रहा।

     अवधि में किसी संपूर्ण काव्य रचना का प्रथम उदाहरण 1379 ईस्वी में मौलाना दाऊद की रचना चंदायन है। मौलाना दाऊद को काव्यभाषा या साहित्य की भाषा के रूप में अवधी को प्रतिष्ठित करने का श्रेय दिया जाता है।

    मुल्ला दाऊद के बाद कुतुबन ने 1503 ईस्वी में मृगावती की रचना की। भाषा, काव्य और काव्यरूप की दृष्टि से यह चंदायान की परंपरा की ही कड़ी है।

    अवधी साहित्य के क्षेत्र में सर्वाधिक अवदान मलिक मोहम्मद जायसी का है। जायसी के काव्य प्रतिभा अत्यंत उर्वर और आध्यात्मिक साधना संपन्न थी। जायसी ने अवधी में 14 ग्रंथों की रचना की थी, इसमें सबसे प्रमुख पद्मावत जिसकी रचना 1527 से 1540 ईसवी के बीच हुई। जायसी ने अपने ग्रंथों में बोलचाल की अवधी को साहित्यिक भाषा के उत्कर्ष पर पहुंचा दिया।

    सूफी कवियों के बाद रामभक्त कवियों ने  अवधी भाषा में काव्य रचना की।  इसमें सबसे प्रमुख तुलसीदास है इन्होंने पार्वती मंगल, जानकी मंगल और रामलला नहच्छू नामक तीन काव्य कृतियों की रचना अवधी भाषा में की। लेकिन उनका रामचरितमानस अवधी भाषा की एक महत्वपूर्ण कृति है। उदा. 

तुम्ह पूछहूं मैं कहत डेराऊं 

धरेहूं मोर घरफोरी नाऊं।

सजी प्रतीति बहूविध गढी छोली 

अवध साढ़साती तव बोली।।

    गोस्वामी तुलसीदास के बाद अगली कड़ी में स्वामी अग्रदास तथा नाभादास की वर्णन शैली में अवधी को देखा जा सकता है। नाभादास का अष्टायाम,  रामचरितमानस की दोहा चौपाई में ही लिखा गया है हालांकि रामचरितमानस पर आधारित लिखी गई किसी भी रचना ने रामचरितमानस का स्थान नहीं लिया।

     वस्तुतः रामचरितमानस की अवधी के काव्य का शिखर है। आगे चलकर बीसवीं शताब्दी में काव्य भाषा के रूप में खड़ी बोली ने अवधी का स्थान ग्रहण किया। लेकिन अवधी भाषा की श्रेष्ठ रचनाएं हमेशा खड़ी बोली के रचनाकारों को प्रेरणा देती रही।

मध्यकाल में काव्य भाषा के रूप में अवधी का विकास (टिप्पणी)

 मध्यकाल में काव्य भाषा के रूप में अवधी का विकास (टिप्पणी)

उत्तर 

    अवधी जैसा कि नाम से ही विदित हैं अवध क्षेत्र की भाषा है। यह अयोध्या से निकला हुआ शब्द है जिसका मुख्य क्षेत्र लखनऊ–फैजाबाद का है। मध्यकालीन आर्य भाषाओं के उद्गम के समय की भाषाओं में अवधी के उद्गम पर विवाद है ।

    भाषा के रूप में अवधि का पहला स्पष्ट उल्लेख अमीर खुसरो की रचना खालिकबारी में मिलता है। खुसरो का समय 1253 से 1325 ईस्वी माना जाता है। अर्थात तेरहवीं सदी के अंत तक अवधी एक भाषा के रूप में स्थापित हो चुकी थी।

    पहले रचना जो पूर्णत: अवधी में हैं और जिसने अवधी को एक झटके में लोक भाषा के पद से उठाकर साहित्यिक भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, वह मुल्ला दाऊद की चंदायन या लोरकहा है। 

    इसी परंपरा में अगली रचना को कुतुबन की मृगावती है जिसकी रचना 1503 में हुई। किंतु सूफी प्रेमाख्यानो की इस समूची परंपरा को सबसे अधिक समृद्धि प्रदान करने वाले कवि मलिक मोहम्मद जायसी है। जायसी की रचनाएं अपने ठेठपन, देशीपन को खोए बिना, मिठास और लोक संस्कृति को धारण करते हुए कथ्य को व्यक्त करती है।

    मध्यकाल में अवधी के काव्य भाषा के रूप में विकसित करने में रामानंद द्वारा प्रवर्तित रामावत संप्रदाय का महत्वपूर्ण योगदान है। इस संप्रदाय का उत्तर भारत पर इतना प्रभाव पड़ा कि कबीर जैसे निर्गुण कवि भी अपने काव्य में राम कथा प्रसंग को समाविष्ट करने लगे।

    इस प्रकार एक रामकाव्यधारा का ही विकास हो गया जो अवधी में पुष्पित–पल्लवित हुई, जिसके प्रधान कवि तुलसीदास हैं। तुलसीदास की सर्वाधिक प्रमुख कृति रामचरितमानस है जो हिंदी में ही नहीं बल्कि विश्व की सभी भाषाओं में सफलतम व सर्वश्रेष्ठ ग्रंथों में से एक है।

    तुलसी और राम काव्य धारा के कवियों की मूल विशेषता जो इन्हें सूफी कवियों से अलग करती है वह है तत्सम शब्दों का प्रयोग प्रयोग। हालांकि यह तत्सम शब्द अवधी को संस्कृत बनाने की वजह तत्सम शब्दों का अवधी रूप में प्रयुक्त करते हैं जैसे 

                                                    लोचनु जल रहे लोचन कोना

                                                    जैसे परम कृपन कर सोना 

        इस प्रकार मध्यकाल में अवधी महत्वपूर्ण काव्य भाषा के रूप में प्रतिष्ठित हुई।

अवहट्ट की व्याकरणिक संरचना का स्वरूप।

अवहट्ट की व्याकरणिक संरचना का स्वरूप।

उत्तर 

       अपभ्रंश के उत्तर कालीन या परवर्ती रूप को अवहट्ट नाम दिया गया है। 11वीं सदी से 14 सदी के अपभ्रंश रचनाकारों ने अपनी भाषा को अवहट्ट कहा। संदेश रासक तथा कीर्तिलता इस भाषा से संबंधित दो महत्वपूर्ण रचनाएं हैं, इसके अतिरिक्त वर्णरत्नाकर तथा प्राकृत पैंगलम को भी इसके स्रोत के रूप में स्वीकार किया गया है।

अवहट्ट की व्याकरणिक सरंचना का स्वरूप

1. संज्ञा तथा कारक व्यवस्था- 
  • सभी प्रतिपादक स्वरांत हो गए।
  • निर्विभक्तिक प्रयोगों की संख्या में वृद्धि। 
  • ‘हि’ विभक्ति का प्रयोग सभी कारको में जैसे जलहिं जलही।

 2. लिंग सरंचना-
  • अपभ्रंश की भांति दो ही लिंग यथा पुल्लिंग एवं स्त्रीलिंग। 
  • नपुसंक लिंग का प्रयोग अस्वीकार्य।

3. वचन व्यवस्था-
  • संस्कृत के तीन वचनों के स्थान पर दो वचन यथा एकवचन एवम बहुवचन।
  • द्विवचन के लोप के साथ ही सरलीकरण की परंपरा आगे बढ़ी जिसमें बहुवचन के बहुत से शब्द एकवचन के रूप में प्रयुक्त होने लगे।

4. सर्वनाम व्यवस्था- 
  • उत्तम पुरुष - मैं, हो, मेरा।
  •  मध्यम पुरुष - तुम, तुम्ह, तुम्हार, तोहार। 
  • अन्य पुरुष - वह, उन्ह।
 
5. विशेषण-
  • कृदंतीय विशेषणों का विकास। 
  • संख्यावाचक विशेषण सात, दस, बीस।
  • सार्वनामिक विशेषण अइस, जइस, जिता, किता।

6. क्रिया सरंचना-
  • कृदंतो के सहारे क्रिया निर्माण की परंपरा में तीव्र गति।
  • धातु - चल, उठ, कह, खा।
  • भूतकालिक कृदंत - भेल, कहल। 
  • पूर्वकालिक क्रिया - उठी देखिअ सुनिअ।

7. काल रचना- 
  • काल रचना के रूप हिंदी की बोलियों की तरह विकसित होने लगे। 
  • पूर्वी हिंदी व पश्चिमी हिंदी की तरह पूर्वी अवहट्ट और पश्चिमी अवहट्ट के रूप में विकसित।

इस प्रकार संस्कृत के सरलीकरण की जो परंपरा पाली से शुरू हुई थी वह अपभ्रंश में आकर हिंदी के निकट होने लगी और  अवहट्ट में उसके विकास की गति तीव्र हो गई।

प्रेमचंद की कहानियों का मूल स्तर (टिप्पणी)

  प्रेमचंद की कहानियों का मूल स्तर (टिप्पणी)
 उत्तर 
        कहानी साहित्य की सबसे सफलतम विधा है, यह एक ऐसा दर्पण है जिसमें व्यक्ति और समाज के परस्पर संबंधों, उनके सुख-दुख के क्षणों की तस्वीरों को देखा जा सकता है। यह हिंदी कहानी की उपलब्धि है कि अपने प्रारंभिक काल में मुंशी प्रेमचंद जैसे मानव मन के कुशल चितेरे मिले।जिन्होंने हिंदी उर्दू में एक नए युग का सूत्रपात किया।
         प्रेमचंद हिंदी कहानी के शिखर पुरुष है उन्होंने अपने रचनाकाल में लगभग 300 कहानियां लिखी जो कि हिंदी कहानी के विकास का एक चरण मात्र न होकर एक छलांग है। 
प्रेमचंद की कहानी परंपरा के विभिन्न उतार-चढ़ाव को ध्यान में रखकर उसे दो चरणों में बांटकर अध्ययन करते हैं     प्रारंभिक तथा परिपक्व
        प्रेमचंद अपने प्रारंभिक दौर (1907 से 1925) में आदर्शवादी कहानियां लिखते थे, जिसका अंत किसी एक घटना के समापन बिंदु, शिक्षा, या हृदय परिवर्तन के साथ होता था। इस दौर में प्रेमचंद पर गांधीवाद, अहिंसा का भी प्रभाव देखने को मिलता है। इस प्रारंभिक दौर में प्रेमचंद की कहानियां किसी निश्चित वर्ग पर आधारित होती थी। जिसमें घटनाओं की संख्या अधिक होती थी। जैसे पंच परमेश्वर, बड़े घर की बेटी, बूढ़ी काकी, मंत्र, मुक्तिपथ आदि।
        1925 तक आते-आते प्रेमचंद पर आदर्शवाद के तत्व कमजोर होने लगे तथा उनकी कहानियों में यथार्थ के तत्व उपस्थित होने लगे जिसका उच्चतम बिंदु कफन कहानी में देखने को मिलता है। अपनी इस परिपक्व कहानी कला की अवस्था में चरित्र स्वतंत्र दिखाई देते हैं तथा वे स्थिति प्रदान कहानियों के रूप में सामने आते हैं जैसे अलग्योझा, ईदगाह, सद्गति, पूस की रात, कफन आदि कहानियों में देखने को मिलते हैं।

कृष्णा सोबती की कहानियां : कथ्य का वैविध्य (टिप्पणी)

 कृष्णा सोबती की कहानियां : कथ्य का वैविध्य (टिप्पणी)
उत्तर 
        कृष्णा सोबती हिंदी की नारी लेखन परंपरा की सशक्त हस्ताक्षर है जिन्होंने न केवल कहानी बल्कि उपन्यास परंपरा में भी प्रमाणिक लेखन का कार्य किया है।
        नारी लेखन के समर्थक नारीवाद की इस प्रमुख मान्यता से सहमत हैं कि नारी की समस्याओं को नारियां ही समझ सकती है, पुरुष नहीं; क्योंकि संवेदना चाहे कितने भी गहरी क्यों न हो वह स्वयंवेदना के समकक्ष नहीं हो सकती।
         कृष्णा सोबती का सबसे प्रसिद्ध कहानी संग्रह ‘बादलों के घेरे’ हैं जो उनकी एक लंबी कथा यात्रा को समेटती है। इसमें सम्मिलित 24 कहानियां को मोटे तौर पर तीन वर्गों में बांटकर विश्लेषण कर सकते हैं— 
        1. प्रथम वर्ग में प्रेम और स्त्री पुरुषों के संबंध की कहानियां हैं जिसमें एक सैलानी किस्म की युवती को केंद्र में रखकर असफल प्रेम की रोमानी और काफी कुछ भावुक लगने वाली स्थितियों को बुना गया है। उदाहरण— 'बादलों के घेरे', 'पहाड़ के साए तले।'
        2. दूसरे वर्ग की कहानियों में स्त्री की नियति को उसके परिवेशगत द्वंदात्मक संबंधों के संदर्भ में आंकने की कोशिश की गई है। इन कहानियों में कृष्णा सोबती निषेध और नकारात्मक दृष्टि को खारिज करती हुई स्त्री की यातना को पूरे सामाजिक परिदृश्य में अंकित करती है। उदाहरण के लिए ‘बदली बरस गई’, ‘आजादी शम्मोजान की’
         3. तीसरे वर्ग में अविभाजित पंजाब और देश विभाजन की त्रासदी या तनाव और विडंबना से संबंधित कहानियां है। उदाहरण — ‘सिक्का बदल गया’, ‘मैं तुम्हारी रक्षा करूंगा’।
         कृष्णा सोबती की कहानियों में भाषा मन की सूक्ष्म संवेदनाओ को पकड़ने की क्षमता रखती है। इनका महत्व उनकी उस साफगोई की वजह से है जो उनके नारी विश्लेषण में दिखती है।




 कृष्णा सोबती की कहानी लेखन में स्त्री विमर्श का संदर्भ बताइए।
 उत्तर

         कृष्णा सोबती हिंदी नारी लेखन की सबसे सशक्त हस्ताक्षर है। जिन्होंने हिंदी कहानी के साथ-साथ उपन्यास परंपरा में भी प्रमाणिक लेखन किया है। नारी लेखन के रचनाकार इस बात से सहमत है कि "नारी की समस्या को केवल नारिया ही समझ सकती है पुरुष नहीं क्योंकि संवेदना चाहे कितने भी गहरे क्यों ना हो वह संवेदना के समकक्ष नहीं हो सकती।"
  •  कृष्णा सोबती की कहानियों में स्त्री विमर्श
    •  कृष्णा सोबती की कहानियों में स्त्री यौनिकता प्रमुखता से केंद्र में आ गई इससे पहले पुरुष यौनिकता ही केंद्र में थी।
    •  कहानियों में मूल समस्या पारिवारिक संबंधों की टूटन और स्त्री-पुरुष संबंधों में आया बदलाव है
    • उनकी कहानी में बोल्डनेस दिखाई देती है जो नारी विश्लेषण का उच्चतम स्तर है। कृष्णा सोबती की कहानियों में नारी को एक स्वतंत्र व्यक्ति का दर्जा मिला।
            वास्तव में उनकी कहानियों में नारी को पहली बार स्वतंत्र व्यक्ति का दर्जा मिला। इस रूप में जो कार्य सिद्धांत के स्तर पर सीमोन दी बाउवर ने किया वहीं हिंदी कहानियों के स्तर पर कृष्णा सोबती ने किया।
        स्त्री की यातना को उसके पूरे सामाजिक परिपेक्ष में अंकित किया है। इस संदर्भ में बदली बरस गई, गुलाब जल गंडेरिया, आजादी शम्मोजान की आदि उल्लेखनीय हैं। वही मित्रो मरजानी का मूल विषय ही है ‘स्त्री पर ला दी गई योजनाओं का अतिक्रमण’ इसकी नायिका तमाम सामाजिक संस्कारों और विश्वासों को खारिज करते हुए अपनी यौन इच्छाओ को सहजता से स्वीकार करती है।



कृष्णा सोबती की कहानियों के आधार पर उसकी कथा भाषा पर एक संक्षिप्त निबंध लिखिए। 

उत्तर

 हिंदी की नारी लेखन परंपरा की सबसे सशक्त हस्ताक्षर कृष्णा सोबती ने कहानी और उपन्यास दोनों विधाओं में प्रमाणिक लेखन किया है। नारी लेखन के समर्थक रचनाकार इस बात से सहमत हैं कि 'नारी की समस्या को केवल नारियां ही समझ सकती हैपुरुष नहीं। क्योंकि संवेदना चाहे कितनी भी गहरी क्यों ना होवह स्वयं वेदना के समकक्ष नहीं हो सकती।'
    कृष्णा सोबती के कथा साहित्य में नारीवाद का यही बीज भाव विकसित हुआ है। कृष्णा सोबती की सबसे प्रसिद्ध लंबी कहानी मित्रो मरजानी है जिसे हिंदी की अब तक की सबसे बोल्ड कहानियों में शुमार किया जाता है जिसका मूल विषय है स्त्री पर ला दी गई यौन वर्जनाओं का अतिक्रमण। इस कहानी ने एक ही झटके में पुरुष यौनिकता के ढांचे को तोड़कर स्त्री यौनिकता को स्वतंत्र पहचान दी।
         कृष्णा सोबती ने अपनी कहानियों में कथ्य के अनुरूप भाषा का चयन किया है तथा उनकी हर रचना में भाषा अपने पारंपरिक अभिव्यक्ति को तोड़ते हुए एक नई अभिव्यक्ति को ढूंढती है।
इनकी कहानियों की भाषा मन की सूक्ष्म संवेदनाओं को पकड़ने की क्षमता रखती है तथा छोटे छोटे वाले संवाद कहानी को प्रभावपूर्ण बनाते हैं।
    कृष्णा सोबती की कथा भाषा में देशज शब्दों का भरपूर मात्रा में प्रयोग हुआ है जैसे मनुक्खमारहुलारेसंयालेभोड़े आदि। इन शब्दों के साथ-साथ गालियों का प्रयोग इनकी कहानी में देखने को मिलता है।
    कृष्णा सोबती ने पहली बार एक ऐसी भाषा शैली विकसित की जिसे पंजाबी मिश्रित हिंदी कहा जा सकता है इसके अतिरिक्त इनकी कहानियों में पंजाब तथा इसके आसपास की आंचलिक संस्कृति का चित्रण देखने को मिलता है।
    हिंदी कहानी में कृष्णा सोबती का महत्व उस साफगोई या बोल्डनेस की वजह से हैजो  नारीविश्लेषण में दिखती है। इनकी कहानी में पहली बार नारी को स्वतंत्र व्यक्ति का दर्जा मिला है। जो कार्यसिद्धांत के स्तर पर लेखिका सिमोन  बोउआ’ ने अपनी रचना ‘ सेकंड सेक्स  में किया थावही हिंदी कहानी में कृष्णा सोबती ने किया।





 

नई कहानी आंदोलन की प्रासंगिकता पर विचार कीजिए।

 नई कहानी आंदोलन की प्रासंगिकता पर विचार कीजिए।

उत्तर

        नई कहानी हिंदी कहानी के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण आंदोलन है जो 1955 से 1963 ईस्वी के बीच विकसित हुआ था। सन 1956 में भैरव प्रसाद गुप्त के संपादन में ‘नई कहानी’ नाम से एक विशेषांक निकाला। इस विशेषांक की कहानियों को नई कहानी कहा गया।

         नई कहानी की पहली कहानी को लेकर विवाद है किंतु सामान्य सहमति यही है कि निर्मल वर्मा द्वारा रचित परिंदे ही नई कहानी की पहली कहानी हैं।

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नई कहानी की प्रासंगिकता 

1. भोगे हुए यथार्थ  पर बल— नई कहानी अनुभूति की प्रमाणिकता पर बल देती है यानी कहानी जीवन के वास्तविक अनुभव के प्रति जवाबदेह होने चाहिए मोहन राकेश तथा निर्मल वर्मा की कहानियां प्रमुख है। शहरी मध्यम वर्ग का जीवन— बड़े शहरों में मध्यम वर्ग की कुछ विशिष्ट समस्याएं होती है जैसे—अकेलापन, अजनबीपन, निरर्थकताबोध आदि को विस्तार पूर्वक व्यक्त किया गया है। अकेली (मन्नू भंडारी), टूटना (राजेंद्र यादव)।

2. मानवीय संबंधों में बिखराव — नई कहानी में रिश्तो में टूटन स्पष्ट तौर पर नजर आता है। ग्रामीण समाज अपने पारंपरिक ढांचे से अलग होकर शहरी मध्यम वर्ग में शामिल हुआ और संयुक्त परिवारों में बिखराव आदि बदलाव देखने को मिलते हैं।

3. स्त्री-पुरुष संबंधों में बदलाव — आत्मनिर्भर बनती हुई नारी जो अपने आत्मसम्मान के साथ समझौता करने को तैयार नहीं थी तथा इस दौर में तलाक तथा विवाहेत्तर संबंध जैसी प्रवृतियां भी तेजी से उभरने लगी। 

4. यौन नैतिकता की पुनर्व्यख्या —इसका दावा है कि नैतिकता इस बात से तय होती है कि व्यक्ति समाज के प्रति कितने कर्तव्य निभाता है। व्यक्ति की यौन इच्छाएं तो भूख, नींद और भय की तरह स्वाभाविक प्रवृत्तियां हैं। इसे नैतिकता से जोड़कर नहीं देखा जा सकता।

5. सामाजिक समस्याओं का चित्रण — इन कहानियों में सामाजिक समस्याओं का भी चित्रण दिखाया गया है जैसे मोहन राकेश की 'मलबे का मालिक' (विभाजन की त्रासदी); धर्मवीर भारती की 'गुलकी बन्नो' (स्त्री के सामाजिक मंच की समस्या); हरिशंकर परसाई की भोलाराम का जीव (भ्रष्टाचार की समस्या) प्रमुख है।

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     नई कहानी ने पहले की परंपरा को एक झटके में बदल डाला। प्रेमचंद का ग्रामीण और सामाजिक यथार्थ हाशिए पर चला गया तथा शहरी मध्यम वर्ग का भोगा हुआ यथार्थ अपनी तमाम निराशा और मोहभंग के साथ केंद्र में आ गया।

साठोतरी हिंदी कहानी (टिप्पणी)

 साठोतरी हिंदी कहानी (टिप्पणी)

उत्तर

 नई कहानी के बाद हिंदी कहानी को सामान्यत: समकालीन कहानी या साठोत्तरी कहानी कहते हैं। इसके अंतर्गत कई कहानी आंदोलन सीमित या व्यापक रूप में दिखते हैं जिसमें प्रमुख है।

1. अकहानी — 1960 के दशक में नई कहानी के विरोध में यह आंदोलन शुरू हुआ जो फ्रांस के एंटी स्टोरी मूवमेंट से प्रभावित था। इस आंदोलन में प्रमुख कहानियां गंगा प्रसाद विमल की 'प्रश्नचिन्ह', दूधनाथ सिंह की 'रीछ' तथा रविंद्र कालिया की 'नौ साल छोटी पत्नी' प्रमुख हैं।

 इस कहानी आंदोलन में जीवन मूल्यों के प्रति तिरस्कार, पुरानी परंपराओं को पूर्ण रूप से नकार, आधुनिकता पर अधिक बल एवं यौन उन्मुक्ता तथा शिल्पगत अमूर्तता आदि विशेषताएं दिखती है।

 2. समानांतर कहानी — समानांतर कहानी आंदोलन आठवें दशक में कमलेश्वर द्वारा 'सारिका' पत्रिका तथा 'समानांतर प्रथम' नामक कहानी संग्रह के माध्यम से प्रतिफलित किया।

 कमलेश्वर, कामतानाथ, इब्राहिम शरीफ, सतीश जमाली आदि इसके प्रमुख कहानीकार है।

 इसमें भाव केंद्रों में जकड़ी कहानी को आम आदमी की पीड़ा से जोड़ने, आत्म केंद्रित अनुभववाद से मुक्ति दिलाई तथा व्यक्ति की असहायता, मूल्यहीनता, नैतिक संकट आदि को रेखांकित किया 

3 जनवादी कहानी — 1982 में नई दिल्ली में जनवादी लेखक संघ की स्थापना के साथ जनवादी कहानी आंदोलन का आरंभ माना जाता है। इसमें रमेश उपाध्याय, शिवमूर्ति, संजीव आदि प्रमुख कहानिकार है।

 यह कहानी आंदोलन सर्वहारा पर किए जा रहे शोषण के प्रति संघर्ष पर बल देती है तथा किसान, मजदूर आदि के संघर्ष को सूक्ष्मता से दिखाती है।

4. सचेतन कहानी — यह आंदोलन 1960 के बाद महीपसिंह द्वारा शुरू किया गया। इसका दावा है कि नई कहानी और कहानी के दौर की कहानियां सत्रांश और निरर्थकता बोध को इतना दर्शाती है कि जीवन जीने की इच्छा खत्म होने लगती है उदाहरण महीपसिंह की कील तथा शैलेश मटियानी की उसने नहीं कहा था।

5. सहज कहानी — इस आंदोलन के प्रवर्तक अमृतराय थे हालांकि उन्होंने इसे कोई आंदोलन नहीं कहा है। इस कहानी धारा का दावा है कि इतने सारे कहानी आंदोलनों की वजह से कहानियों में मूल कथा रस खत्म हो गया है। नासिरा शर्मा तथा रमेश बन्ना इसके प्रमुख कहानीकार है 

6. सक्रिय कहानी — 1962 में राकेश वत्स द्वारा मंच पत्रिका के माध्यम से शुरू किया गया। जिसमें उन्होंने कहा कि कहानीकारों को अपनी रचनाओं में केवल समस्याओं को प्रस्तुत न करना चाहिए बल्कि पाठक को उससे लड़ने का हौसला भी देना चाहिए। 'हमें अपनी लड़ाई खुद लड़नी है' तथा 'एक न एक दिन' इसकी प्रमुख कहानियां है।

मध्यकाल में काव्य भाषा के रूप में अवधी का विकास (टिप्पणी)

 मध्यकाल में काव्य भाषा के रूप में अवधी का विकास (टिप्पणी)

उत्तर 

    अवधी जैसा कि नाम से ही विदित हैं अवध क्षेत्र की भाषा है यह अयोध्या से निकला हुआ शब्द है जिसका मुख्य क्षेत्र लखनऊ फैजाबाद का है। मध्यकालीन आर्य भाषाओं के उद्गम के समय की भाषाओं में अवधी के उद्गम पर विवाद है।

    भाषा के रूप में अवधी का पहला स्पष्ट उल्लेख अमीर खुसरो की रचना ‘खलीकबारी’ में मिलता है। खुसरो का समय 1253 से 1325 ईस्वी तक माना जाता है अर्थात तेरहवीं सदी के अंत तक अवधी एक भाषा के रूप में स्थापित हो चुकी थी।

   पहली रचना जो पूर्णत अवधी में है और जिसने अवधी को एक ही झटके में लोक भाषा के पद से उठाकर साहित्यिक भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई— मुल्ला दाऊद की ‘चंदायन’ या ‘लोरीकहा’ है।

    इसी परंपरा में अगली रचना कुतुबन की मृगावती है जिसकी रचना 1503 ईस्वी में हुई किंतु सूफी प्रेमाख्यानो की इस समूची परंपरा को सबसे अधिक समृद्धि प्रदान करने वाले कवि मलिक मोहम्मद जायसी है।

     जायसी की रचनाऐं ठेठपन, देसीपन को खोए बिना, मिठास और लोक संस्कृति को धारण करते हुए कथ्य को व्यक्त करती है।

     मध्यकाल में अवधी के काव्य भाषा के रूप में विकसित करने में रामानंद द्वारा प्रवर्तित रामावत संप्रदाय का महत्वपूर्ण योगदान है। इस संप्रदाय का उत्तर भारत पर इतना प्रभाव पड़ा कि कबीर जैसे निर्गुण कवि भी अपने काव्यो में राम कथा प्रसंग को समाविष्ट करने लगे।

     इस प्रकार एक रामकाव्यधारा का ही विकास हो गया जो अवधी में पुष्पित पल्लवित हुई जिसके प्रधान कवि तुलसीदास हैं। तुलसीदास की सर्वाधिक प्रमुख कृति रामचरितमानस हिंदी में ही नहीं बल्कि विश्व की सभी भाषाओं में सफलतम व सर्वश्रेष्ठ ग्रंथों में से एक है।

     तुलसी और राम काव्य धारा के कवियों की मूल विशेषता जो इन्हें सूफी कवियों से अलग करती है वह है तत्सम शब्दों का प्रयोग हालांकि ये तत्सम शब्द अवधी को संस्कृत बनाने की बजाय तत्सम शब्दों को अवधी रूप में प्रयुक्त करते हैं जैसे -

                             " लोचनु जल रहे लोचन कोना 
                              जैसे परम कृपन कर सोना" 

    इस प्रकार मध्यकाल में अवधी महत्वपूर्ण काव्य भाषा के रूप में प्रतिष्ठित हुई।

अकहानी आंदोलन के स्वरूप को स्पष्ट कीजिए।

 अकहानी आंदोलन के स्वरूप को स्पष्ट कीजिए।                              

उत्तर

    नई कहानी के बाद हिंदी कहानी में कई आंदोलन सीमित तथा व्यापक रूप में दिखाई देते हैं जिसमें प्रमुख हैअकहानी, समानांतर कहानी, जनवादी कहानी, सहज कहानी तथा सक्रिय कहानी।

    अकहानी आंदोलन 1960 के दशक में नई कहानी के विरोध में प्रारंभ हुआ था तथा यह फ्रांस की ‘एंटी स्टोरी मूवमेंट’ से प्रभावित है। इस आंदोलन की कहानियों में जीवन के प्रति अस्वीकार का भाव, सभी मूल्य में गहरी आस्था दिखती है।

    अकहानी आंदोलन की प्रमुख कहानियां-

        ‘प्रश्नचिन्ह’ - गंगा प्रसाद विमन 
        ‘रिछ’ - दूधनाथ सिंह

        ‘नौ साल छोटी पत्नी’ - रविंद्र नाथ कालिया

अकहानी आंदोलन का स्वरूप

क) जीवन मूल्यों का तिरस्कार - अकहानी जीवन मूल्यों की चुनौती देती हुई नई प्रश्न उपस्थित करती है जिससे   इसमें भाव बोध के धरातल पर आत्मपीड़न, ऊब, अकेलापन, अजनबीपन का चित्रण दिखाई देता है।

ख) परंपराओं का पूर्ण नकार - अकहानी पुरानी परंपराओं से अपने संबंध तोड़ देती है तथा उसके प्रति नफरत और गुस्से की आग से जलती हुई मालूम पड़ती है।
ग) अतिशय आधुनिकता - अकहानी अतिशय आधुनिकता पर जोर देती है जिससे वह समाज से कट जाती है। यह संबंधहीनता तथा संबंधाभाव जैसी स्थितियों को उपस्थित करती है जो बहुत ही तकलीफदेह होती है।
घ) यौन उन्मुक्तता पर बल - अकहानी परपुरुष या परस्त्री के साथ संभोग के दृश्य का वर्णन विस्तार से करती है तथा समलैंगिक संपर्क एवं पशु संपर्क की कहानियां भी लिखी गई है।
ड़) शिल्पगत अमूर्तता - शिल्प के स्तर पर अकहानी पारंपरिक शिल्प का विरोध करती है किंतु यह नए शिल्प के प्रति भी उदासीन है जिससे यह लगता है कि यह एक शिल्पहीन आंदोलन है।  
    कुल मिलाकर कहे तो अकहानी अमूर्त शैली लेकर चलती है तथा सभी मूल्यों के प्रति गहरी अनास्था प्रकट करती है। साथ ही यह कहानी धारा निरर्थकता बोध को प्रश्रय देती है।

कृष्णा सोबती की कहानियों के आधार पर उसकी कथा भाषा पर एक संक्षिप्त निबंध लिखिए।

कृष्णा सोबती की कहानियों के आधार पर उसकी कथा भाषा पर एक संक्षिप्त निबंध लिखिए। 

उत्तर

 हिंदी की नारी लेखन परंपरा की सबसे सशक्त हस्ताक्षर कृष्णा सोबती ने कहानी और उपन्यास दोनों विधाओं में प्रमाणिक लेखन किया है। नारी लेखन के समर्थक रचनाकार इस बात से सहमत हैं कि 'नारी की समस्या को केवल नारियां ही समझ सकती है, पुरुष नहीं। क्योंकि संवेदना चाहे कितनी भी गहरी क्यों ना हो, वह स्वयं वेदना के समकक्ष नहीं हो सकती।'
    कृष्णा सोबती के कथा साहित्य में नारीवाद का यही बीज भाव विकसित हुआ है। कृष्णा सोबती की सबसे प्रसिद्ध लंबी कहानी मित्रो मरजानी है जिसे हिंदी की अब तक की सबसे बोल्ड कहानियों में शुमार किया जाता है जिसका मूल विषय है स्त्री पर ला दी गई यौन वर्जनाओं का अतिक्रमण। इस कहानी ने एक ही झटके में पुरुष यौनिकता के ढांचे को तोड़कर स्त्री यौनिकता को स्वतंत्र पहचान दी।

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         कृष्णा सोबती ने अपनी कहानियों में कथ्य के अनुरूप भाषा का चयन किया है तथा उनकी हर रचना में भाषा अपने पारंपरिक अभिव्यक्ति को तोड़ते हुए एक नई अभिव्यक्ति को ढूंढती है।
इनकी कहानियों की भाषा मन की सूक्ष्म संवेदनाओं को पकड़ने की क्षमता रखती है तथा छोटे छोटे वाले संवाद कहानी को प्रभावपूर्ण बनाते हैं।
    कृष्णा सोबती की कथा भाषा में देशज शब्दों का भरपूर मात्रा में प्रयोग हुआ है जैसे मनुक्ख, मार, हुलारे, संयाले, भोड़े आदि। इन शब्दों के साथ-साथ गालियों का प्रयोग इनकी कहानी में देखने को मिलता है।
    कृष्णा सोबती ने पहली बार एक ऐसी भाषा शैली विकसित की जिसे पंजाबी मिश्रित हिंदी कहा जा सकता है इसके अतिरिक्त इनकी कहानियों में पंजाब तथा इसके आसपास की आंचलिक संस्कृति का चित्रण देखने को मिलता है।
    हिंदी कहानी में कृष्णा सोबती का महत्व उस साफगोई या बोल्डनेस की वजह से है, जो  नारीविश्लेषण में दिखती है। इनकी कहानी में पहली बार नारी को स्वतंत्र व्यक्ति का दर्जा मिला है। जो कार्य, सिद्धांत के स्तर पर लेखिका सिमोन बोउआने अपनी रचना सेकंड सेक्स  में किया था, वही हिंदी कहानी में कृष्णा सोबती ने किया।


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कृष्णा सोबती की कहानी लेखन में स्त्री विमर्श का संदर्भ बताइए।
 उत्तर
         कृष्णा सोबती हिंदी नारी लेखन की सबसे सशक्त हस्ताक्षर है। जिन्होंने हिंदी कहानी के साथ-साथ उपन्यास परंपरा में भी प्रमाणिक लेखन किया है। नारी लेखन के रचनाकार इस बात से सहमत है कि "नारी की समस्या को केवल नारिया ही समझ सकती है पुरुष नहीं क्योंकि संवेदना चाहे कितने भी गहरे क्यों ना हो वह संवेदना के समकक्ष नहीं हो सकती।"
  •  कृष्णा सोबती की कहानियों में स्त्री विमर्श
    •  कृष्णा सोबती की कहानियों में स्त्री यौनिकता प्रमुखता से केंद्र में आ गई इससे पहले पुरुष यौनिकता ही केंद्र में थी।
    •  कहानियों में मूल समस्या पारिवारिक संबंधों की टूटन और स्त्री-पुरुष संबंधों में आया बदलाव है
    • उनकी कहानी में बोल्डनेस दिखाई देती है जो नारी विश्लेषण का उच्चतम स्तर है। कृष्णा सोबती की कहानियों में नारी को एक स्वतंत्र व्यक्ति का दर्जा मिला।
            वास्तव में उनकी कहानियों में नारी को पहली बार स्वतंत्र व्यक्ति का दर्जा मिला। इस रूप में जो कार्य सिद्धांत के स्तर पर सीमोन दी बाउवर ने किया वहीं हिंदी कहानियों के स्तर पर कृष्णा सोबती ने किया।
        स्त्री की यातना को उसके पूरे सामाजिक परिपेक्ष में अंकित किया है। इस संदर्भ में बदली बरस गई, गुलाब जल गंडेरिया, आजादी शम्मोजान की आदि उल्लेखनीय हैं। वही मित्रो मरजानी का मूल विषय ही है ‘स्त्री पर ला दी गई योजनाओं का अतिक्रमण’ इसकी नायिका तमाम सामाजिक संस्कारों और विश्वासों को खारिज करते हुए अपनी यौन इच्छाओ को सहजता से स्वीकार करती है।
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 कृष्णा सोबती की कहानियां : कथ्य का वैविध्य (टिप्पणी)
उत्तर 
        कृष्णा सोबती हिंदी की नारी लेखन परंपरा की सशक्त हस्ताक्षर है जिन्होंने न केवल कहानी बल्कि उपन्यास परंपरा में भी प्रमाणिक लेखन का कार्य किया है।
        नारी लेखन के समर्थक नारीवाद की इस प्रमुख मान्यता से सहमत हैं कि नारी की समस्याओं को नारियां ही समझ सकती है, पुरुष नहीं; क्योंकि संवेदना चाहे कितने भी गहरी क्यों न हो वह स्वयंवेदना के समकक्ष नहीं हो सकती।
         कृष्णा सोबती का सबसे प्रसिद्ध कहानी संग्रह ‘बादलों के घेरे’ हैं जो उनकी एक लंबी कथा यात्रा को समेटती है। इसमें सम्मिलित 24 कहानियां को मोटे तौर पर तीन वर्गों में बांटकर विश्लेषण कर सकते हैं— 
        1. प्रथम वर्ग में प्रेम और स्त्री पुरुषों के संबंध की कहानियां हैं जिसमें एक सैलानी किस्म की युवती को केंद्र में रखकर असफल प्रेम की रोमानी और काफी कुछ भावुक लगने वाली स्थितियों को बुना गया है। उदाहरण— 'बादलों के घेरे', 'पहाड़ के साए तले।'
        2. दूसरे वर्ग की कहानियों में स्त्री की नियति को उसके परिवेशगत द्वंदात्मक संबंधों के संदर्भ में आंकने की कोशिश की गई है। इन कहानियों में कृष्णा सोबती निषेध और नकारात्मक दृष्टि को खारिज करती हुई स्त्री की यातना को पूरे सामाजिक परिदृश्य में अंकित करती है। उदाहरण के लिए ‘बदली बरस गई’, ‘आजादी शम्मोजान की’
         3. तीसरे वर्ग में अविभाजित पंजाब और देश विभाजन की त्रासदी या तनाव और विडंबना से संबंधित कहानियां है। उदाहरण — ‘सिक्का बदल गया’, ‘मैं तुम्हारी रक्षा करूंगा’।
         कृष्णा सोबती की कहानियों में भाषा मन की सूक्ष्म संवेदनाओ को पकड़ने की क्षमता रखती है। इनका महत्व उनकी उस साफगोई की वजह से है जो उनके नारी विश्लेषण में दिखती है।


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UPSC PRELIMS EXAM 2026 PAPER -II (CSAT)

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