सूफी कवियों द्वारा प्रयुक्त अवधी के स्वरूप पर विचार कीजिए।

सूफी कवियों द्वारा प्रयुक्त अवधी के स्वरूप पर विचार कीजिए। 

 उत्तर

        भाषा के रूप में अवधी का पहला स्पष्ट उल्लेख अमीर खुसरो की रचना ‘खलीकबारी’ में मिलता है। इस रचना में अमीर खुसरो अपने समय की भाषाओं का जिक्र करते हुए अवधी भाषा का भी उल्लेख करते हैं। 

        साहित्यिक भाषा के रूप में अवधी के तीव्र विकास का संबंध एक सुयोग से है। भारत की विभिन्न लोक भाषाओं में संस्कृत परंपरा से ही विकसित प्रेमकथाओं को रचने की प्रवृत्ति काफी अधिक व्याप्त थी। ऐसी प्रेम कथाओं में उर्वशी–पुरुरवा आख्यान, उषा–अनिरुद्ध कथा, मालती–माधव कथा आदि काफी प्रचलित थी।

 विभिन्न सूफी कवियों द्वारा अवधी का प्रयोग

  • मौलाना दाऊद— 1379 ईस्वी में मौलाना दाऊद ने ‘चंदायन’ की रचना की। जिसकी भाषा पूर्वी हिंदी या अवधी मानी जा सकती है। गोपाल राय के शब्दों में मौलाना दाऊद का सबसे अधिक महत्व इस बात से है कि उन्होंने एक बोलचाल की भाषा को अपनी सृजनात्मक प्रतिभा से श्रेष्ठ काव्य भाषा का रूप दे दिया।

दाऊद कवि जो चांदा गाई।
जेई रे सुना सो गा मुरझाई।। 

  • मलिक मोहम्मद जायसी— सूफी प्रेमाख्यान की समूची परंपरा को सबसे अधिक समृद्धि प्रदान करने वाले कवि जायसी है। जिन्होंने ठेठ अवधी का प्रयोग करते हुए 14 ग्रंथों की रचना की। जिसमें पद्मावत (1527–1540) सबसे महत्वपूर्ण है।

यह तन जारौ छार के कहौ कि पवन उडाव।
मकु त्तेही मारग उडि परै कन्त धरै जहं पाँव।। 

  • मंझन— जनसाधारण की बोली को अपनाकर उन्होंने सजीव और प्रभावशाली काव्यो की रचना की। साहित्य और भाषा की दृष्टि से इन का अपना महत्व है। मंजन की अवधी अधिक सरल और सटीक है।
  • उस्मान— जायसी के बाद उस्मान का नाम लिया जाता है। इनकी रचना ‘चित्रावली’ पद्मावत के आधार पर ही है।

    सूफी काव्य परंपरा शताब्दियों तक चलती रही पर भाषा की दृष्टि से बाद के कवियों ने जायसी का ही अनुसरण किया।

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