उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ी बोली की प्रतिष्ठा के प्रमुख कारण क्या थे? स्पष्ट कीजिए।

 उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ी बोली की प्रतिष्ठा के प्रमुख कारण क्या थे? स्पष्ट कीजिए।

 उत्तर

        खड़ी बोली हिंदी भारत की सबसे अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा है। व्यवहार में यह उस भू-भाग की भाषा मानी जाती है जिसकी सीमा पश्चिम में जैसलमेर, उत्तर पश्चिम में अंबाला, उत्तर में शिमला से लेकर नेपाल के पूर्वी छोर तक के पहाड़ी क्षेत्र, पूर्व में भागलपुर, दक्षिण पूर्व में रायपुर खंडवा तक पहुंचती है।

         19वीं शताब्दी में खड़ी बोली में अचानक तेजी से महत्वपूर्ण परिवर्तन होने लगते हैं और यह देखते ही देखते पूरे हिंदी प्रदेश की संपर्क भाषा के रूप में स्थापित हो जाती है। खड़ी बोली का विकास अपने आप में एक आयामी का स्वायत घटना न हो पर ब्रजभाषा के पतन से संबंधित है।

         भारतेंदु पूर्व युग में खड़ी बोली के विकास में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका फोर्ट विलियम कॉलेज की रही। इस कॉलेज के प्रिंसिपल गिलक्रिस्ट द्वारा हिंदी व्याकरण तथा शब्दकोश का निर्माण किया गया, जिसके सहायक थे इंशा अल्लाह खान, लल्लू लाल, सदल मिश्र, सदासुख लाल।

         इंशा अल्लाह खान उर्दू भाषा के अच्छे विद्वान थे इसलिए उनकी भाषा में वाक्य विन्यास पर फारसी का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है। लल्लू लाल की भाषा में उस काल की सारी विशेषताएं जैसे गद्य में लय और तुक का प्रयोग, अलंकारो, लोकोक्तियां और मुहावरे का अधिक प्रयोग आदि। इसके अलावा ईसाई मिशनरियों द्वारा बाइबिल का अनुवाद तथा पत्र-पत्रिकाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

         भारतेंदु युग अथवा 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में खड़ी बोली हिंदी की दो शैलियों का विकास हुआ जो राजा शिवप्रसाद सितारे हिंद और राजा लक्ष्मण सिंह के द्वारा किया गया।

         राजा शिव प्रसाद ने हिंदी का गंवारूपन दूर कर उसे उर्दू–ए–मुअल्ला बना दिया तो राजा लक्ष्मण सिंह ने विशुद्ध संस्कृतनिष्ट हिंदी का समर्थन किया।

        हिंदी सही मायने में भारतेन्दु युग में "नई चाल में ढली" और उसके समय में हिंदी के गद्य का बहुमुखी रूप का सूत्रपात हुआ।

         सौभाग्य से 1903 में आचार्य द्विवेदी ने सरस्वती पत्रिका का संपादन संभाला। उन्होंने हिंदी के परिष्कार का बीड़ा उठाया और उसे बखूबी रूप प्रदान किया।

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