खुसरो की कविता की विशेषताएं।
उत्तर
अमीर खुसरो जिन का वास्तविक नाम अबुल फजल था। ये एक महान कवि, सूफी संत व संगीतज्ञ के साथ-साथ अन्य विधाओं के अविष्कारक के रूप में गिने जाते हैं। 14 शताब्दी के आरंभ में वे जिस भाषा का प्रयोग कर रहे थे, वह खड़ी बोली आधुनिक काल में दिखाई देती है।
- खुसरो की रचनाएं अवधी तथा ब्रजभाषा में भी दिखाई देती है किंतु उनकी कविताओं में लिखित खड़ी बोली आज की खड़ी बोली के इतने अधिक निकट हैं कि आश्चर्य में डाल देती है।
- खुसरो साहित्य में एक शैली वह हैं जिनमें खड़ी बोली एकदम आधुनिक व शुद्ध रूप में दिखती है। उदाहरण–
एक थाल मोती से भरा सबके सिर औंधा धरा।
चारों और वह थाल फिरे मोती उनमें एक ना गिरे।।
- खुसरो की में कविताओं में दूसरा प्रयोग वहां दिखता है जहां वे खड़ी बोली और ब्रजभाषा के आरंभिक रूपों को मिला देते हैं जैसे–
खुसरो दरिया प्रेम का, उल्टी वाकी धार।
जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार ।।
उपरोक्त उदाहरण में वाकी शब्द ब्रजभाषा का है जबकि शेष सारा ढांचा खड़ी बोली का है।
- इन शैलीयो के अलावा खुसरो ने ऐसी अन्य रचनाएं भी लिखी है जिनमें खड़ी बोली, ब्रजभाषा और फारसी एक ही प्रवाह में शामिल हो गई–
गोरी सोवे सेज पर मुख पर डारे केस।
चल खुसरो घर आपने रैन भई चहुं देश।।
कुल मिलाकर यह मानना पड़ता है कि आमिर खुसरो भाषिक प्रयोगों के द्वारा अपने समय और भविष्य की भाषिक प्रवृत्तियों का सुंदर समन्वय स्थापित कर चुके थे।