संत साहित्य के महत्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर–
भक्तिकाल की प्रथम धारा को संत काव्यधारा कहा जाता है । यह भक्ति साहित्य की निर्गुण काव्यधारा में ज्ञानाश्रयी शाखा से संबंधित है । निर्गुणपंथी कवियों को संत कहने की परम्परा प्रचलित थी । संत काव्यधारा में कबीरदास, गुरुनानक, दादूदयाल, सुन्दरदास, रज्जब आदि प्रमुख कवि है ।
संत काव्यधारा , हिन्दी साहित्य मे न केवल ‘भावपक्ष’ के कारण बल्कि 'शिल्पपक्ष’ के कारण भी विशेष महत्व रखता है। संत काव्यधारा मे कवि निर्गुण ब्रह्म के प्रति आस्था रखते थे।
“जो विधुडे हे पियारे से भटकते दर-बदर फिरते।
हमारा यार है हममे हमन को इन्तजारी क्या।।”
निर्गुण ब्रह्म में आत्मा के विलयन को इन्होंने जीव का अंतिम लक्ष्य माना तथा इसके लिए भक्ति मार्ग को अपनाया। इस धारा ने जाति-पाति भेदभाव से परे सबके लिए भक्ति का मार्ग प्रशस्त किया।
“जाति - पाति पूछे नहीं कोई।
हरि का भजे सो हरि का होई।।”
अनुभव की प्रामाणिकता , सामाजिक कुरितियो का विरोध तथा आडम्बरो पर तार्किक प्रश्न के माध्यम से इस धारा के कवियों ने सदियों से उपेक्षित दलित समाज के अन्दर आत्मविश्वास भरा तथा समाज मे करुणा, दया, प्रेम जैसे सात्विक मूल्यों को बढ़ाया ।
इस प्रकार संतकाव्य धारा के कवियों ने प्रचलित शास्त्रीय प्रतिमानों की अपेक्षा करते हुए नई धारा में काव्य रचा, जिसने आगे चलकर 'मुक्तक छंद', स्वच्छद काव्य जैसी काव्यधारा का विकास किया ।
No comments:
Post a Comment