देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता।
उत्तर –
देवनागरी लिपि एक वैज्ञानिक लिपि है। विश्व के किसी भी कोने में प्रयुक्त वर्णमाला उतने वैज्ञानिक रुप में वर्गीकृत नहीं है , जितने कि नागरी लिपि वैज्ञानिक रूप में वर्गीकृत है।
अन्य लिपियो जैसे उर्दू तथा रोमन लिपि एवं व्यंजन या व्यंजन के वैज्ञानिक वर्ग मिले - जुले रूप में रखे गये हैं। लेकिन देवनागरी लिपि में इस प्रकार की गड़बड़ी नहीं है। इसमें स्वर अलग है और व्यंजन अलग है।
समवेततः प्रारम्भ मे मूल स्वर ( अ, आ, इ, ई, उ, ऊ ) और उनके संयुक्त स्वर ( ए , ऐ , ओ , बो ) तथा व्यंजनों का विशेषकर स्पर्श एवं अनुनासिक का विभाजन तो और भी वैज्ञानिक है।
क, च, ट, त, प के वर्ग, स्थान पर आधारित के और हर व्यंजन वर्ग के व्यंजन घोषत्व के आधार पर दो प्रकार का होता है - प्रथम दो अघोष तथा अंतिम तीन संघोष। इसके साथ ही इनके वर्गीकरण या विभाजन में प्राणतत्व का भी ध्यान रखा गया है। पहले तीसरे और पांचवें अल्पप्राण है तथा दूसरे , चौथे महाप्राण।
भाषा की ध्वनियाँ उच्चारण की दृष्टि से विशेषतः परिवर्तित होती रहती है। जिसका आशय यह हुआ कि एक समय में यह विशेषता किसी लिपि में होती है तथा किसी में नहीं। अंग्रेजी में यह गड़बड़ी है जैसे- 'क' ध्वनि के लिए C, K, CH, CK, Q आदि, लेकिन देवनागरी लिपि में इस प्रकार का अवगुण नहीं है।
देवनागरी लिपि में स्वर यदि स्वतंत्र रूप आते हैं तो पूरे वर्ण- चिन्ह का प्रयोग होता है जैसे- आग, ईद। किन्तु व्यंजन के साथ ‘अ’ के अतिरिक्त अन्य स्वरो का मात्रा - रूप प्रयोग होता है जैसे नाग, चतुर आदि।
इस प्रकार अनेक दृष्टियो से देवनागरी लिपि अत्यन्त वैज्ञानिक लिपि है, तथा उसकी कई विशेषताएं ऐसी हो जो अन्य लिपियों में देखने को नहीं मिलती है।
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