रहीम की कविता के मर्म का उद्घाटन कीजिए एवं उसकी लोकप्रियता के कारणों का निर्देश कीजिए।
उत्तर
रहीम अर्थात अब्दुल रहीम खानखाना अकबर के प्रसिद्ध दरबारी सहयोगी तथा सेनापति थे। किंतु उनकी प्रसिद्धि का मूल आधार उनका साहित्य है। रहीम हिंदी साहित्य के भक्ति काल की कृष्ण काव्य धारा के कवियों में प्रमुख माने गए हैं।
रहीम कविता पारखी थे। जीवन की कठोर सच्चाई उनके दोहो में दिखाई देती है, जैसा कि हमें कबीर के दोहों में दिखाई देती है। इसके साथ ही उनकी समकालीन कवियों के साथ अच्छी बनती थी।
उनकी लोकप्रियता के कारण
- रहीम की रचनाओं में सर्वाधिक प्रचलित उनके दोहे ही हैं जो राजनीति, समाज, नैतिकता आदि से जुड़े हुए हैं
एक साधे सब सधे, सब साधे सधि जाए।
रहिमन मुलहिं सिंचिबो, फूले–फले अघाय।।
- रहीम की रचनाओं में मार्मिक व्यथा भी दिखती है पर वे इसे किसी से बांटने से बचते हैं—
रहिमन निजमन की व्यथा, मनहीं राखो गोय।
सुनी उठ लिहै सब लोग, बाटे ना लिये कोय।।
- उनकी दानशीलता का गुण काफी चर्चित था पर वे उनका श्रेय लेने से बचते थे। जब भी वे दान देते थे अपनी आंखें नीचे कर लेते थे–
देन हार कोई और है, भेजत सो दिन रेन।
लोग भरम हम पर धरे, याते नीचे नैन।।
- रहीम दोहे के साथ-साथ सोरठे, बरवे, मंदनालुक आदि के लिए भी जाने जाते हैं। वस्तुतः उनकी लोकप्रियता का मूल कारण उसमें निहित व्यथा थी।
- वे जिन बातों से पीड़ित होते थे उसे अपनी रचना का रूप देते थे जो कि साधारण बोलचाल की भाषा होती थी।
- वे जिंदगी भर जीवन के उतार-चढ़ावो को झेलते रहे जिसमें उनके बाल्यावस्था में पिता की मृत्यु होने पर दीनता का अनुभव उनकी कविताओं में देख सकते हैं।
- उनका भक्ति रस सांप्रदायिक नहीं था। वे मुसलमान होकर भी कृष्ण भक्त थे यह सब उनकी लोकप्रियता में चार चांद लगाते हैं।