अवहट्ट की व्याकरणिक संरचना का स्वरूप।
उत्तर
अपभ्रंश के उत्तर कालीन या परवर्ती रूप को अवहट्ट नाम दिया गया है। 11वीं सदी से 14 सदी के अपभ्रंश रचनाकारों ने अपनी भाषा को अवहट्ट कहा। संदेश रासक तथा कीर्तिलता इस भाषा से संबंधित दो महत्वपूर्ण रचनाएं हैं, इसके अतिरिक्त वर्णरत्नाकर तथा प्राकृत पैंगलम को भी इसके स्रोत के रूप में स्वीकार किया गया है।अवहट्ट की व्याकरणिक सरंचना का स्वरूप
1. संज्ञा तथा कारक व्यवस्था-
- सभी प्रतिपादक स्वरांत हो गए।
- निर्विभक्तिक प्रयोगों की संख्या में वृद्धि।
- ‘हि’ विभक्ति का प्रयोग सभी कारको में जैसे जलहिं जलही।
2. लिंग सरंचना-
- अपभ्रंश की भांति दो ही लिंग यथा पुल्लिंग एवं स्त्रीलिंग।
- नपुसंक लिंग का प्रयोग अस्वीकार्य।
3. वचन व्यवस्था-
- संस्कृत के तीन वचनों के स्थान पर दो वचन यथा एकवचन एवम बहुवचन।
- द्विवचन के लोप के साथ ही सरलीकरण की परंपरा आगे बढ़ी जिसमें बहुवचन के बहुत से शब्द एकवचन के रूप में प्रयुक्त होने लगे।
4. सर्वनाम व्यवस्था-
- उत्तम पुरुष - मैं, हो, मेरा।
- मध्यम पुरुष - तुम, तुम्ह, तुम्हार, तोहार।
- अन्य पुरुष - वह, उन्ह।
5. विशेषण-
- कृदंतीय विशेषणों का विकास।
- संख्यावाचक विशेषण सात, दस, बीस।
- सार्वनामिक विशेषण अइस, जइस, जिता, किता।
6. क्रिया सरंचना-
- कृदंतो के सहारे क्रिया निर्माण की परंपरा में तीव्र गति।
- धातु - चल, उठ, कह, खा।
- भूतकालिक कृदंत - भेल, कहल।
- पूर्वकालिक क्रिया - उठी देखिअ सुनिअ।
7. काल रचना-
- काल रचना के रूप हिंदी की बोलियों की तरह विकसित होने लगे।
- पूर्वी हिंदी व पश्चिमी हिंदी की तरह पूर्वी अवहट्ट और पश्चिमी अवहट्ट के रूप में विकसित।
इस प्रकार संस्कृत के सरलीकरण की जो परंपरा पाली से शुरू हुई थी वह अपभ्रंश में आकर हिंदी के निकट होने लगी और अवहट्ट में उसके विकास की गति तीव्र हो गई।