उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ी बोली के विकास पर प्रकाश डालिए।

उन्नीसवी शताब्दी में खड़ी बोली के विकास पर प्रकाश डालिये
उत्तर 
19 वीं शताब्दी में खड़ी बोली के विकास को दो खंड़ों में बांटा जा सकता है-
  • पूर्व भारतेन्दु युग 
  • भारतेन्दु युग 
        पूर्व भारतेन्दु युग मे खड़ी बोली के विकास की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण घटना 1800 ई. मे कोलकाता मे फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना है। इस कॉलेज से जुड़े अनेक व्यक्तियों ने हिन्दी के विकास में सराहनीय योगदान दिया। जिसमे ईशा अल्ला खां, लल्लू लाल, सदल मिश्र, तथा सदासुख लाल का योगदान अविस्मरणीय है। 
        ईशा अल्ला खां द्वारा रचित ‘रानी केतकी की कहानी’ पर फारसी प्रभाव होने के बावजूद भी ताजा और जीवन्त है और इसका हिन्दी गद्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान है। लल्लू लाल ने ‘प्रेमसागर’, सदल मिश्र ने ‘नाचिकेतोपख्यान’ की रचना कर हिन्दी के विकास में अपना योगदान दिया।
        भारतेन्दु पूर्व युग में अनेक पत्र-पत्रिकाओं का भी हिन्दी में प्रकाशन हुआ। जैसे उदंड मार्तंड (1826 ई.) बंगदूत आदि। इसके अलावा ईसाई धर्म प्रचारकों ने जनता को शिक्षित करने के लिए स्कूल कॉलेज खोले साथ ही इतिहास, भूगोल, विज्ञान आदि पुस्तकों का हिन्दी में प्रकाशन किया। 
        खड़ी बोली हिन्दी के विकास में भारतेन्दु का आगमन ( 1850-85 ) एक क्रांतिकारी घटना है। वे प्रगतिशील राष्ट्रीय चेतना के प्रतिनिधि थे। हिन्दी गद्य विधा सही मायने में उन्हीं के समय में नयी चाल मे ढली। 
        भारतेन्द्र द्वारा प्रतिष्ठापित भाषा के इस मानदंड को तत्कालिन बहुधा साहित्यकारों ने अपनाया। जिसमे प्रताय नारायण मिश्र, बद्रीनारायण चौधरी आदि के नाटको, देवकीनंदन खत्री व गहमरी के उपन्यासो, किशोरी लाल गोस्वामी की कहानियां आदि में ये शैलिया दिखाई देती है।
        हालांकि भारतेन्दु की भाषा नीति को सभी लेखक कार्यान्वित नहीं कर सके, लेकिन एक हद तक भारतेन्दु द्वारा स्थापित मानदंडों से सभी प्रभावित हुए जो द्विवेदी युग में अपनी पूर्ण सफलता को प्राप्त कर सकी।

UPSC Prelims 2025 Paper PDF – Download Now & Analyze Your Performance

UPSC Prelims 2025 Paper PDF: UPSC Prelims 2025 Paper PDF – Download Now & Analyze Your Performance PdF link Available in this Post.... c...