मध्यकाल में काव्य भाषा के रूप में प्रयुक्त ब्रज की विशेषताएं (टिप्पणी)

मध्यकाल में काव्य भाषा के रूप में प्रयुक्त ब्रज की विशेषताएं (टिप्पणी)
उत्तर 

        हिंदी परिवार की जिस बोली को हम ब्रजभाषा के नाम से जानते हैं इसका संबंध ब्रज प्रदेश या ब्रजमंडल से है इस भाषा का विकास पुरानी हिंदी के आसपास से ही किसी ना किसी मात्रा और रूप में दिखाई देने लगता है। हालांकि काव्य भाषा के रूप में इसका तीव्र विकास भक्ति काल के उत्तरार्ध में हुआ।
        ब्रजभाषा ने अपने विकास का चरम अनुभव रीतिकाल के दौरान किया। भक्ति काल के बाद रितिकाल या उत्तर मध्यकाल में ब्रज एकमात्र काव्य भाषा के रूप में स्थापित हो गई।
  • ब्रज भाषा की मूल शक्ति इस बात में निहित है कि यह कोमलता और माधुर्य की भाषा है जिसके कारण ब्रजभाषा वात्सल्य एवं श्रृंगार के क्षेत्र में एक विशिष्ट भाषा बन गई।
  • माधुर्य गुण की अत्यधिक उपस्थिति के कारण ब्रजभाषा श्रंगार की मार्मिकता का जितना गहरा उद्घाटन कर पाती है उतना कोई और भाषा नहीं।
  • ब्रजभाषा गति प्रवाह व चंचलता की दृष्टि से एक बेहतरीन भाषा है। इसमें रचनाकार बहुत तीव्र गति से बाहों को उतार-चढ़ाव करते हुए अपनी बात को बेहद कम शब्दों में कह देता है।
  • ब्रज भाषा में एक विशेष गुण भाषाई लचीलापन का भी है यह गुण वैसे तो सभी बोलियों में होता है किंतु ब्रजभाषा में तुलनात्मक रूप से अधिक है।
  • ब्रज भाषा में श्रंगार व वात्सल्य में विशेषीकृत होने के बावजूद अन्य भावो को धारण करने में असमर्थ नहीं हुई—
 “कौन करेजो नहीं कसकत
                                    सुनी बिपति बाल विधवन की” (प्रताप नारायण मिश्र)
  • ब्रजभाषा में संगीतात्मक्ता और तन्मयता का जो सर्वोच्च स्तर मिलता है। वह किसी भी अन्य बोली में नहीं दिखता—
“भरी रही भनक भनक तार ताननि की।
         तनक तनक तामे झनक झनक चुरीन की।।” (देव)

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