संत साहित्य में अवधी का योगदान।
उत्तर
साहित्यिक दृष्टि से मध्य युग में ब्रजभाषा के बाद अवधी का स्थान महत्वपूर्ण है जगनिक के आल्हा खंड में अवधी के प्रयोग मिलते हैं। हालांकि मूल आल्हाखंड पश्चिमी हिंदी में था और भाटो के माध्यम से उसमें अवधी का मिश्रण हुआ।
मलूकदास, धरनीदास, जगजीवन, दुल्हन आदि संतों की भाषा में अवधी का पुट तो है किंतु वह इस युग की वही हिंदी है जिससे सधुक्कडी कहा गया है।
मध्यकाल में अवध एक प्रमुख राजनीतिक केंद्र के रूप में विकसित हुआ और यहां बसने वाले हिंदुओं और मुसलमानों में सौहार्द तथा सामंजस्य अधिक रहा। यही कारण है कि इस क्षेत्र में सूफी काव्य धारा विकसित हो सकी।
संत कवियों में बाबा मलूक दास की अवधी क्षेत्र के थे। इनकी बानी का अधिकांश भाग अवधी में है, इसके शिष्य बाबा मथुरा दास की बानी अधिकतर अवधी में ही है। इसके अलावा कई अन्य संतों ने भी अवधी को अपने उपदेश की भाषा बनाया है।