सिद्ध नाथ साहित्य में प्रयुक्त खड़ी बोली का प्रारंभिक रूप (टिप्पणी)
सिद्ध संप्रदाय हिंदू परंपरा से प्रभावित बौद्ध परंपरा का एक आंदोलन हैं और इनके द्वारा रचित साहित्य सिद्ध साहित्य है। सिद्धों की कुल संख्या 84 मानी गई है जिसमें सरहपा, कण्हपा, सबरपा तथा लुईपा प्रमुख हैं।
इसी प्रकार नाथ संप्रदाय परंपरा और उनके सिद्धांत बौद्ध मत के वज्रयानी सिद्धों से मिलते हैं। इस संप्रदाय के प्रवर्तक गोरखनाथ हैं। इन्होंने सिद्धों की योग प्रदान साधना पद्धति के स्थान पर संयम तथा निर्वती पर आधारित पद्धति अपनाई। नाथों की संख्या 9 मानी गई है जिसमें चर्पटीनाथ, गोरखनाथ, जालंधरनाथ प्रमुख है।
सिद्ध साहित्य में खड़ी बोली का रूप–
- सिद्धों ने दोहो तथा चर्यापदो के रूप में साहित्य की रचना की जो अर्धमगधी अपभ्रंश के निकट है जिस पर आरंभिक हिंदी का असर दिखता है–
घर की बईसी दीवा जली।
कोणही बईसी से घंड़ा चाली।।
- इनकी भाषा समकालीन भाषिक प्रवृत्तियों का अनुसरण करती हुई अनेक लोक बोलियों के तत्व अपने भीतर संजोए हुए हैं।
- तांतिया नामक एक सिद्ध के द्वारा रचित छंद में हम सिद्धों द्वारा प्रयुक्त खड़ी बोली के आरंभिक रूप को पहचान सकते हैं–
जो सो बुज्झी सो धनि बुद्धी।
जो सो चोर सोई साधी।।
नाथ साहित्य में खड़ी बोली का स्वरूप–
- सिद्धों की भांति नाथ भी यायावर रहे तथा इनकी भाषा में विभिन्न बोलियों का सहज सामंजस्य दिखाई देता है।
- गोरखनाथ के द्वारा रचित काव्य के एक अंश में हम खड़ी बोली के पूर्वाभास को देख सकते हैं–
अवधू रहया हाटे–वाट रुख विरख की छाया।
तंजीवा काम क्रोध लोभ मोह संसार की माया।।
- नाथपंथी सिद्धों की वाणी के उदाहरण आज भी खड़ी बोली में इतने नजदीक हैं कि यदि समय का संकेत ना हो तो यह उन्नीसवीं सदी के बाद की रचनाएं लगती हैं
गगन मंडल महीं रोपे थमा।।
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