प्रेमचंद के उपन्यासों में अभिव्यक्त यथार्थवाद के स्वरूप पर प्रकाश डालिए।

प्रेमचंद के उपन्यासों में अभिव्यक्त यथार्थवाद के स्वरूप पर प्रकाश डालिए।

        यथार्थवाद यानी जो वस्तु जैसी है उसे उसी रूप में प्रस्तुत करना। किंतु कला और साहित्य के क्षेत्र में लोग यथार्थवाद के स्थान पर आदर्शवाद अथवा आदर्शोन्मुखी यथार्थवाद शब्द का प्रयोग करते हैं। कोई भी साहित्यकार चाहे वह कितना भी यथार्थवादी क्यों ना हो, बिना कल्पना के पंखों पर सवार हुए भावजगत में परिभ्रमण नहीं कर सकता। अतः किसी न किसी स्तर पर यथार्थवादी साहित्यकार को भी कल्पना का सहारा लेते हुए आदर्शवादिता की ओर उन्मुख होना ही पड़ता है। आज का उपन्यासकार देव–चरित्र या दानव–चरित्र में बांट कर पात्रों की सृष्टि नहीं करता, बल्कि उसके चरित्र मानवीय अधिक है जिसमें गुणों एवं दुर्गुणों का संतुलन है।

         प्रेमचंद के उपन्यासों गोदान, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, निर्मला, गबन आदि में उनका आदर्शोंमुखी यथार्थवादी स्वरूप ही सामने आया है। उन्होंने अपने यथार्थ को कल्पना से सवार कर इस रूप में प्रस्तुत किया जिससे कि वह बड़ा रोचक, मनोरंजन एवं शिक्षाप्रद बन सके। प्रेमचंद का होरी ना तो कोरा आदर्शवादी है और ना ही पूरी तरह यथार्थवादी उसमें अनेक गुण दोष हैं। यही स्थिति गोबर, धनिया, मालती, मेहता एवं राय साहब की हैं।

         प्रेमचंद ने हिंदी कथा साहित्य को मनोरंजन के स्तर से ऊपर उठाकर जीवन के साथ जोड़ने का काम किया। वस्तुतः सेवा सदन के प्रकाशन के साथ ही हिंदी उपन्यास को नई दिशा प्राप्त हो गई इस उपन्यास में उन्होंने विवाह से जुड़ी समस्याओं तथा दहेज प्रथा, कुलीनता का प्रश्न, पत्नी का स्थान आदि को उठाया है। किंतु इन्हें प्रस्तुत करने का ढंग पूर्ववती उपन्यासों से एकदम अलग है। निर्मला में उन्होंने दहेज प्रथा तथा अनमेल विवाह की समस्या को प्रस्तुत किया है। कृषक जीवन की समस्याओं का यथार्थ चित्रण उन्होंने प्रेमाश्रम और गोदान में किया है। ग्रामीण जीवन का ऐसा प्रामाणिक चित्रण इस उपन्यास में हुआ कि इसे सभी जगह सराहना प्राप्त हुई है।

         समाज में व्याप्त छुआछूत एवं सांप्रदायिकता की समस्याओं को भी उन्होंने अपने उपन्यासों में अभिव्यक्ति दी है। इस प्रकार प्रेमचंद के उपन्यास जीवन के विविध पहलुओं से जुड़े हुए हैं प्रेमचंद के उपन्यासों में विषय की विविधता एवं व्यापकता के साथ-साथ चरित्रों का स्वाभाविक विकास दिखाया गया है। गबन की केंद्रीय समस्या आभूषण प्रेम की समस्या नहीं है समस्या है नारी स्वतंत्र्यता, पुरुष षड्यंत्र का विरोध एवं गरीब जनता की आर्थिक सामाजिक मुक्ति। प्रेमचंद ने दिखाया है कि नारियों में आभूषण–प्रेम आर्थिक असुरक्षा की भावना की परिणति हैं। प्रेमचंद जी ने इस उपन्यास में यह बताया कि पुलिस, कानून व्यवस्था को नियमित बनाने के लिए नहीं है वह तो इस पराधीन देश की जनता के खिलाफ साम्राज्यवादियों के हाथों की लाठी है। रंगभूमि में प्रेमचंद जी ने औद्योगीकरण का विरोध कराकर अंततः उद्योग खुलने दिया है वे जानते थे कि समाज की अगली दिशा वैज्ञानिक प्रगति की दिशा है।

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