“गोदान तक आते-आते प्रेमचंद का आदर्शवाद से पूरी तरह मोहभंग हो जाता है” इस कथन का परीक्षण कीजिए।

“गोदान तक आते-आते प्रेमचंद का आदर्शवाद से पूरी तरह मोहभंग हो जाता है” इस कथन का परीक्षण कीजिए। 

        हिंदी में उपन्यास विधा का प्रचलन भारतेंदु युग से ही हो गया था। अंग्रेजी के शुरुआती उपन्यासों की भांति हिंदी के उपन्यास में आदर्शवाद और रोमानियत के तत्वों से भरे पड़े थे।

 
        प्रेमचंद के लेखन से ही उपन्यास यथार्थवाद से जुड़ना शुरू होता है। फिर भी प्रेमचंद पर गांधीवादी आदर्शवाद, हृदय परिवर्तन, सुधारवाद का गहरा प्रभाव था। उनकी शुरुआती उपन्यासों में इसकी स्पष्ट झलक देखी जा सकती है किंतु उनका आदर्शवाद कौरा आदर्शवाद नहीं है, भावगत आदर्शवाद हैं अर्थात उन्होंने तत्कालीन भारतीय समाज की समस्याओं को यथार्थ चित्रण किया है किंतु उनका समाधान ‘अहिंसा’ तथा ‘पाप से घृणा करो पापी से नहीं’ सिद्धांतों के अनुकूल हृदय परिवर्तन से किया है। उदाहरण के लिए ‘प्रेमाश्रम’ तथा ‘कर्मभूमि’ दोनों में किसानों की समस्याओं को यथार्थ ढंग से उठाया गया है। प्रेमाश्रम के मनोहर का चरित्र भी गोबर की तरह विद्रोही है किंतु रचना का अंत हृदय परिवर्तन के माध्यम से हुआ है।


         नारी पराधीनता को सेवा सदन की सुमन के माध्यम से उन्होंने उठाया है किंतु इसका समाधान आदर्शवाद में हुआ है लेकिन उनका गोदान तक आते-आते उनका आदर्शवाद से मोहभंग होने लगा था तथा मार्क्सवाद की तरह झुकाव होने लगा था। कर्मभूमि में यह आदर्शवाद थोड़ा कमजोर पड़ता है तथा गोदान में तो क्षीण ही हो जाता है।


         गोदान में जमीदार का शोषण ‘प्रेमाश्रम’ की तरह है, गोदान का किसान कर्मभूमि के किसान ही है। गोदान में धर्म और मरजाद की वहीं समस्या है जो प्रतिज्ञा, सेवा सदन और निर्मला में है किंतु गोदान में इन समस्याओं के समाधान के लिए न तो राय साहब मिस्टर खन्ना का हृदय परिवर्तन हुआ है और ना ही चेतना बदली है। गोदान में शोषण तंत्र आदर्शवादी तरीके से समाप्त नहीं हुआ है बल्कि शोषण तंत्र अन्त में भी बना हुआ है और होरी जैसा अदम्य जिजीविषा और साहस रखने वाला व्यक्ति भी शोषण तंत्र के जाल में फंस कर दम तोड़ देता है तथा गोबर भी शोषण तंत्र से हार जाता है।


           इस प्रकार कहा जा सकता है कि गोदान तक आते-आते प्रेमचंद का आदर्शवाद यथार्थवाद में बदल गया है किंतु यह यथार्थवाद शुष्क और कोरा नहीं है बल्कि इसमें भारतीय मूल्य छुपे हुए हैं। इस कारण इस उपन्यास में कहीं-कहीं आदर्शवाद दिख जाता है।

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