अवहट्ट की व्याकरणिक विशेषताएं (टिप्पणी)

अवहट्ट की व्याकरणिक विशेषताएं (टिप्पणी) 
उत्तर 

        मध्यकालीन आर्य भाषाओं के विकास क्रम में पाली, प्राकृत और अपभ्रंश के बाद भी कुछ अनगढ़ ग्राम्य अथवा आंचलिक रूप वाली भाषा को विद्वानों ने अवहट्ट की संज्ञा दी है। अवहट्ट का काल 14 सदी के आसपास तक हैं।
        अवहट्ट हर रूप में अपभ्रंश की उत्तराधिकारिणी हैं। इसलिए इसमें अपभ्रंश  की सभी व्याकरणिक विशेषताएं तो दिखती है साथ ही कुछ अन्य विशेषताएं भी दिखती है।

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  • अवहट्ट की व्याकरणिक विशेषताएं 
    • संज्ञा के स्तर पर चल रही सरलीकरण की प्रवृत्ति और अधिक विकसित हुई। सभी प्रतिपादक स्वरांत, व्यंजनांतता की प्रवृत्ति लुप्त, निर्विभक्तिक प्रयोगों की संख्या में वृद्धि हुई।
    • अवध में अपभ्रंश की सभी ध्वनियों के साथ दो नई ध्वनियों का विकास — ‘ऐ’, ‘औ’ जैसे रहइ>रहै, चउहट्ट>चौहट।
    • ‘हि’विभक्ति या परसर्ग का प्रयोग प्राय: सभी कारको में होता है जो कि अवहट्ट की सबसे बड़ी विशेषता है।
    • अपभ्रंश की भांति अवहट्ट में भी दो ही लिंग हैं — पुल्लिंग तथा स्त्रीलिंग 
    • अपभ्रंश में संस्कृत के 3 वचनों के स्थान पर 2 वचनों (एकवचन तथा बहुवचन) के प्रयोग की परंपरा और आगे बढ़ी तथा बहुवचन के बहुत सारे शब्द एकवचन के रूप में प्रयुक्त होने लगे। 
    • सर्वनामों के क्षेत्र में अवहट्ट में कई नए प्रयोग देखने को मिलते हैं जैसे- 
      • उत्तम पुरुष — मैं, हो, मेरा 
      • मध्यम पुरुष — तुम, तुम्ह, तुम्हार, तोहार
      • अन्य पुरुष — वह, उन्ह
    • अवहट्ट मे कृदंतीय विशेषणों का विकास तीव्र गति से होने लगा जो कि लिंग, वचन के अनुसार परिवर्तित होते हैं जैसे अइस, जइस, ऐसो।
    • कृदंतो के सहारे क्रिया—निर्माण की परंपरा प्रारंभ हुई थी, वह अवहट्ट में पूर्ण विस्तार के साथ दिखाई देती हैं। उदाहरण भेल,उठी देखिअ सुनिअ।
    • अवहट्ट में काल रचना के रूप भी हिंदी की बोलियों की तरह विकसित होने लगे थे। जैसे करत(वर्तमानकाल), गईल(भूतकाल),  जाईब(भविष्य काल)।
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